Breaking News; केबिनेट मंत्रियों के गढ़ में मुरझाया कमल, क्षेत्र में हार से पार्टी चिंतित

मिशन-2022 से पहले सत्ता का सेमीफाइनल कहे जा रहे जिला पंचायत के चुनाव में प्रदेश सरकार के कैबिनेट और राज्यमंत्रियों के गढ़ों में भी कमल ‘मुरझा’ गया। भाजपा गोरखपुर क्षेत्र से जुड़े वन मंत्री दारा सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली है। यही हाल खेलकूद व युवा कल्याण मंत्री उपेंद्र तिवारी के विधानसभा क्षेत्र में भी है। जिला पंचायत चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप नतीजा नहीं आने की समीक्षा करा रहे भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ गई है।

समीक्षा में जो तथ्य सामने आए हैं, वह आगामी विधानसभा चुनाव से पहले डरा रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता कैबिनेट व राज्य मंत्रियों के क्षेत्रों में हार की है।

इसकी रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व को भेजी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक सूबे के कृषि मंत्री व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के विधानसभा क्षेत्र में भाजपा केवल एक सीट जीत पाई है। इस क्षेत्र में दो आंशिक को मिलाकर जिला पंचायत के दस वार्ड हैं। स्वास्थ्य मंत्री राजा जय प्रताप सिंह के विधानसभा क्षेत्र से जिला पंचायत चुनाव के नतीजे निराश करने वाले हैं। यही हाल कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के क्षेत्र का है। राज्यमंत्रियों के विधानसभा क्षेत्रों में भी नतीजे निराशाजनक हैं।

गोरखपुर क्षेत्र से हैं नौ मंत्री
भाजपा गोरखपुर क्षेत्र से आजमगढ़, बस्ती और गोरखपुर मंडल के दस जिले जुड़े हैं। इन जिलों में विधानसभा की 62 सीटें हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां से 44 सीटें जीती थी। इसी लिहाज से योगी मंत्रिमंडल में चार कैबिनेट व पांच राज्यमंत्रियों को जगह मिली है। इसमें से कुछ के पास स्वतंत्र प्रभार भी है।

मंत्रिमंडल के फेरबदल में दिखेगा चुनावी नतीजों का असर
योगी सरकार के मंत्रिमंडल में अगर फेरबदल हुआ तो जिला पंचायत चुनाव के नतीजों का असर दिखेगा। जिन मंत्रियों के क्षेत्र में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा है, उनका ओहदा कम किया जा सकता है। मंत्रिमंडल से हटाए भी जा सकते हैं। इससे चिंतित मंत्री अपनी कमजोरी को छुपाने में लगे हैं। पार्टी नेतृत्व से कह रहे हैं कि जिसे टिकट देने के लिए कहा गया, उसे सूची से बाहर कर दिया गया। हालांकि, ज्यादातर टिकट इनकी सिफारिश पर ही दिए गए थे। इसकी रिपोर्ट बनाकर पार्टी आलाकमान को भेजी जा रही है। संगठन की तरफ से बताया जा रहा है कि किस विधायक की सिफारिश पर किसे टिकट दिया गया था।

सूर्य प्रताप शाही, कृषि मंत्री (कैबिनेट मंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- पथरदेवा, जिला- देवरिया
जिला पंचायत वार्ड-10, भाजपा जीती केवल एक (सुजीत प्रताप सिंह चुनाव जीते)
हार की वजह : स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव जीतने के बाद विधायक या कृषि मंत्री का विधानसभा क्षेत्र में आना-जाना कम हो गया। इससे नाराजगी बढ़ी है। इस क्षेत्र के ज्यादातर टिकट कृषि मंत्री की सिफारिश पर दिए गए थे, फिर भी पार्टी प्रत्याशियों को करारी हार मिली है। पार्टी आलाकमान को भेजी रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि मंत्री विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते हैं। भाजपा नेता, कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जनहित से जुड़े मामलों का सही ढंग से निपटारा नहीं होता है। लंबे समय से राजनीति कर रहे हैं, लेकिन बेटे सुब्रत शाही को पथरदेवा का ब्लॉक प्रमुख बनवाने की मुहिम में ही जुटे हैं। परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप भी हैैं।
चिंता : नाराजगी का यही आलम रहा तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

राजा जय प्रताप सिंह, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, मातृ एवं शिशु कल्याण (कैबिनेट मंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- बांसी, जिला- सिद्धार्थनगर
जिला पंचायत वार्ड-10 सीट (दो आंशिक)
भाजपा ने जीती दो सीट (वार्ड 29 से मीना जीतीं)
हार की वजह- सातवीं बार चुनाव जीते हैं, फिर भी जिला पंचायत चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप नतीजे नहीं आए हैं। पार्टी के ही लोग आरोप लगाते हैं कि क्षेत्र में पार्टी की पकड़ कमजोर हो गई है। इसकी प्रमुख वजह पार्टी नेताओं की आपसी गुटबाजी भी है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री हैं, फिर भी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी नहीं हैं। 50 बेड का अस्पताल बनवा रहे हैं। यह जल्द शुरू हो सकता है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में काफी दिक्कत हुई। इससे भी नाराजगी बढ़ी है।
चिंता : आगामी विधानसभा चुनावों में अपेक्षित परिणाम न मिलने का डर। डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू की गई।

स्वामी प्रसाद मौर्य, श्रम, सेवा योजन व समन्वय मंत्री (कैबिनेट मंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- पडरौना सदर, जिला- कुशीनगर
जिला पंचायत वार्ड-10 (आंशिक सहित) भाजपा ने जीतीं तीन सीटें
हार की वजह : स्थानीय जानकार कहते हैं कि कोरोना का संकट गहराया तो स्थानीय विधायक व मंत्री का आना जाना कम हो गया। भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं से बहुत मेल-जोल नहीं है। कहा जा रहा है कि मंत्री ने चुनाव में खास दिलचस्पी नहीं ली। प्रत्याशियों के चयन में भी सावधानी नहीं बरती। मनचाहा टिकट दिया गया। वार्ड 55 से ऐसे उम्मीदवार को टिकट दिया गया, जिसके पास प्रचार करने का बजट नहीं था। इस उम्मीदवार को करारी शिकस्त मिली है।
चिंता : मंत्री स्थानीय नहीं हैं। ऐसे में नाराजगी और बढ़ सकती है। जिला पंचायत के चुनाव के नतीजे से झटका लगा है।

दारा सिंह चौहान, वन, पर्यावरण व जंतु उद्यान मंत्री (कैबिनेट मंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- मधुवन, जिला- मऊ
जिला पंचायत वार्ड- नौ, भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली
हार की वजह : समीक्षा में समाने आया है कि वन मंत्री मऊ के मधुवन से विधायक जरूर हैं, लेकिन उनका क्षेत्र में आना-जाना कम होता है। वह मूलरूप से आजमगढ़ के रहने वाले हैं। कहा जा रहा है कि स्थानीय विधायक के तौर पर जिला पंचायत वार्डों के चुनाव में रुचि नहीं ली। वन मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का एक भी जिला पंचायत सदस्य चुनाव नहीं जीत सका है। कार्यकर्ता व नेताओं की नाराजगी भारी पड़ी।
चिंता: हार का असर विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। स्थितियां समय से नहीं संभाली गईं तो अपेक्षानुरूप नतीजे नहीं आएंगे।

जय प्रकाश निषाद, मत्स्य पालन, पशुधन व दुग्ध विकास मंत्री (राज्यमंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- रुद्रपुर, जिला- देवरिया
पंचायत वार्ड- आठ, भाजपा को दो सीटें मिलीं
हार की वजह : जानकारों का कहना है कि मंत्री का नाम भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में उछला था। इस मामले में कुछ पत्रकार जेल गए हैं। इसका असर चुनाव में देखने को मिला। मंत्री अपने परिवार को राजनीति में आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। बहू को गौरीबाजार से ब्लॉक प्रमुख बनवाने की मुहिम में लगे हैं। भाजपा नेता व कार्यकर्ताओं का कोई उपयुक्त काम नहीं हो रहा है। इससे नाराजगी बढ़ी है। कहा जा रहा है कि चुनाव के दौरान कार्यकर्ता घर बैठ गए। इस वजह से पार्टी प्रत्याशी व उनके चुनाव चिह्न की जानकारी मतदाताओं तक नहीं पहुंचाई जा सकी। इसी का नतीजा रहा कि ज्यादातर सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है।
चिंता- परिवार व भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के बाद पार्टी की साख प्रभावित हुई है। इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव में भी दिख सकता है।

डॉ सतीश द्विवेदी, बेसिक शिक्षामंत्री (राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार)
विधानसभा क्षेत्र- इटवा, जिला- सिद्धार्थनगर
पंचायत वार्ड- सात, भाजपा मिलीं चार सीटें
हार की वजह : बेसिक शिक्षा मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन कुछ हद तक ठीक रहा है। विधायक के तौर पर मंत्री ने जिन प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने की सिफारिश की थी, उनके लिए चुनाव प्रचार भी किया। इसी का नतीजा रहा कि चार सीटों पर जीत मिली है। हालांकि, तीन सीटें पार्टी हारी है। इसपर चिंतन चल रहा है। पार्टी को इस क्षेत्र से सभी सीटों पर जीत मिलने की उम्मीद थी।
चिंता: आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी नेताओं की गुटबाजी दूर करनी पड़ेगी। तभी जिले की अलग-अलग विधानसभा सीटों पर अपेक्षानुरूप सफलता मिल सकेगी।

आनंद स्वरूप शुक्ला, ग्राम्य विकास, समग्र ग्राम विकास व संसदीय कार्य मंत्री (राज्यमंत्री)
विधानसभा क्षेत्र- शहर, जिला-बलिया
पंचायत वार्ड-10, भाजपा को मिलीं दो सीटें
हार की वजह : स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि क्षेत्र में सुविधा-संसाधनों का अभाव है। दमदारी से चुनाव नहीं लड़ा गया। इसलिए दस में दो सीटों पर पार्टी प्रत्याशी को जीत मिल सकी है। कहा जा रहा है कि मंत्री बनने के बाद से विधायक का क्षेत्र में बहुत आना-जाना नहीं रहता है। कार्यक्रमों में हिस्सा लेने आते हैं, फिर चले जाते हैं। भाजपा नेता व कार्यकर्ताओं का सामान्य काम भी नहीं हो पा रहा है। इससे नाराजगी बढ़ी है।
चिंता: शहरी क्षेत्र में हार से दिक्कत बढ़ी है। वोटिंग का यही ट्रेंड आगामी विधानसभा चुनाव में रहा तो दिक्कत और बढ़ सकती है।

श्रीराम चौहान, उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार व कृषि निर्यात (राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार)
विधानसभा क्षेत्र-घनघटा, जिला- संतकबीरनगर
जिला पंचायत वार्ड- दस, भाजपा को दो सीटें मिलीं
हार की वजह : चुनाव जीतने के बाद से विधायक का क्षेत्र में आना-जाना कम हो गया है। स्थानीय लोग कहते हैं कि प्रतिनिधि मुन्नू पाल पूरा कामकाज देखते हैं। भाजपा नेता व कार्यकर्ताओं के सामान्य काम भी नहीं होते हैं। इस क्षेत्र के हैंसर मंडल अध्यक्ष का घनघटा के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक से विवाद हुआ था। मामला विधायक व पार्टी नेताओं तक पहुंचा था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नतीजा रहा कि पूर्व मंडल अध्यक्ष सहित 40 कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दे दिया था। यह घटना पंचायत चुनाव के बाद की है, लेकिन इस तरह की नाराजगी कार्यकर्ताओं में पहले से रही है। यही नाराजगी चुनाव में भारी पड़ी है। पार्टी में गुटबाजी चरम पर है।
चिंता : गुटबाजी खत्म करने की चुनौती। कार्यकर्ताओं की संतुष्टि का ख्याल रखकर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ना होगा।


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