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भारत-यूरोप संबंध: सिर्फ FTA नहीं, बदलती दुनिया में EU ने भारत को चुना अपना ‘चौथा स्तंभ’

World News: यूरोपीय आयोग और यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं की भारत यात्रा एक बड़ा रणनीतिक संकेत है। यह दौरा केवल मुक्त व्यापार समझौते तक सीमित नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों के अनुसार यह यात्रा वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौर में अहम है। अमेरिका के साथ यूरोप के संबंधों में भी अनिश्चितता बढ़ी है।

विदेश मामलों के विशेषज्ञ रॉबिंदर सचदेव ने इस परिस्थिति की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि यूरोप इस समय तीन तरफ के दबाव में है। अमेरिका, रूस और चीन से यूरोपीय संघ को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने यूरोप की रणनीतिक सुरक्षा को प्रभावित किया है। रूस पर प्रतिबंधों के कारण ऊर्जा आपूर्ति भी बाधित हुई है।

यूरोप की रणनीति में भारत की बढ़ती भूमिका

रूसीगैस की आपूर्ति रुकने से यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई। चीन यूरोप की उदारवादी सोच से वैचारिक रूप से अलग है। फिर भी चीन यूरोपीय औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा बना हुआ है। ऐसी पेचीदा स्थिति में यूरोपीय संघ ने एक नया रास्ता चुना है। उसने भारत को अपनी भू-राजनीतिक रणनीति का चौथा स्तंभ मानना शुरू कर दिया।

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यूरोपीय संघ को दीर्घकालिक स्थिरता और भरोसेमंद साझेदार की तलाश है। विविधीकृत व्यापार ढांचे की भी उसे जरूरत महसूस हो रही है। भारत एक बड़ा और तेजी से उभरता हुआ देश है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इसे इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाती है। इसलिए यूरोप ने भारत की ओर रुख किया है।

सचदेव के मुताबिक यह मामला सिर्फ मुक्त व्यापार समझौते का नहीं है। भारत के लिए यूरोपीय संघ की बीस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था तक पहुंच महत्वपूर्ण है। वहीं यूरोप के लिए भारत एक विशाल बाजार है। यह बाजार चीन पर निर्भरता कम करने में यूरोप की मदद कर सकता है।

बदलती वैश्विक गतिशीलता और नई साझेदारी

भारत नेहमेशा संतुलित विदेश नीति का पालन किया है। यूरोप अब अमेरिका पर अपनी अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकलना चाहता है। दोनों पक्षों की यह रणनीतिक आवश्यकता एक नए समीकरण को जन्म दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी केवल आर्थिक नहीं होगी।

रॉबिंदर सचदेव ने ईरान और वेनेजुएला जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है। पारंपरिक गठबंधनों की मजबूती अब पहले जैसी नहीं रही। इस बदलाव ने नई वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया है।

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इस नई व्यवस्था में भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों का रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। दोनों पक्ष एक दूसरे के लिए प्राकृतिक साथी साबित हो सकते हैं। उनके बीच लोकतांत्रिक मूल्यों और साझा हितों का आधार मौजूद है। यह साझेदारी भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रख सकती है।

यूरोपीय संघ की यह पहल उसकी लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा लगती है। वह अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध और लचीला बनाना चाहता है। भारत इस लक्ष्य को प्राप्त करने में उसकी मदद कर सकता है। इससे दोनों पक्षों को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिलने की संभावना है।

यह सहयोग व्यापार और निवेश के नए द्वार खोलेगा। प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। दोनों क्षेत्रों के बीच लोगों के आवागमन में भी आसानी होगी। इस तरह यह संबंध बहुआयामी और टिकाऊ साबित हो सकते हैं।

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