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कोविड अपडेट हिमाचल; शिमला में तड़पते रहते है मरीज, कोरोना में बेटा खोने पर बोली मां

कोरोना मरीजों को दी जा रही सुविधाओं को हिमाचल सरकार दावा कर रही है कि हर मरीज का ख्याल रखा जा रहा है। सूबे का सबसे बड़ा अस्पताल आईजीएमसी शिमला का प्रशासन भी दावे कर रहा है कि मरीजों को सुविधाएं दी जा रही हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। कोरोना से अपनी मां को खोने वाले हरमीत सिंह ने आईजीएमसी प्रशासन की पोल खोली है। हरमीत का कहना है कि आईजीएमसी में ठीक नहीं है। डॉक्टरों से लेकर पैरा मेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। हरमीत सिंह ने बताया कि 13 अप्रैल को उनकी 76 वर्षीय मां गुरबचन कौर की कोरोना ने सांसे छीन ली। उन्होंने बताया कि जब कोरोना टेस्ट के लिए आईजीएमसी गए थे, उस वक्त वहां लंबी लाइन लगी थी।

युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक कई घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ा। उस लाइन में कौन संक्रमित है, किसी को पता नहीं, लाइन में घंटो खड़े रहने से अच्छा-खासा व्यक्ति भी पॉजिटिव हो सकता है। वहां कोई गाइड करने वाला नहीं है, यहां तक की पर्ची बनाने में भी परेशानी झेलनी पड़ी।

भर्ती होने पर अस्तपाल में ज्यादा परेशानी

अस्पताल में दाखिल होने के बाद परेशानी और ज्यादा बढ़ गई. उन्होंने कहा कि वॉर्ड हालत दयनीय थी। अपनी मां के लिए हरमीत कोरोना वार्ड के भीतर चला गया था और अंतिम क्षण तक अपनी मां के साथ रहा। हरमीत ने बताया कि डॉक्टर्स और पेरा मेडिकल स्टाफ की कमी के चलते कई मरीजों को समय पर मदद नहीं मिल पाई। रात को करीब अढ़ाई बजे उनकी मां की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी और आइसोलेशन वॉर्ड में ले जाया गया, काफी देर इंतजार करने के बाद वॉर्ड में अंदर दाखिल हुए। मरीज के व्हील चेयर के साथ ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर गए थे, लेकिन आइसोलेशन वार्ड में ऑक्सीजन नहीं थी। इस बीच सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म हो गई। काफी देर तक सिलेंडर नहीं मिल पाया, फोन पर फोन किए लेकिन मदद नहीं मिली। कुछ देर बाद वो खुद सिलेंडर लाने के लिए चले गए। दो मंजिल चढ़कर खुद कंधे पर उठाकर सिंलेडर को लाया।

हरमीत ने बताया कि वॉर्ड के भीतर उन्होंने कई मरीजों के सिलेंडर खुद बदले. टेक्निकल स्टाफ नदारद रहता था। कोई सिलेंडर चेंज करने नहीं आता था, कोई देखकर राजी नहीं था कि कहां किस मरीज के पास ऑक्सीजन की कमी है या सिलेंडर बदलना है। ऑक्सीजन के लिए भीख मांगनी पड़ती थी. मरीजों के साथ तीमारदार कोई नहीं होता, ऐसी स्थिती में जरा सोचिए मरीज कैसे रहता होगा। नर्स और डॉक्टर्स भी क्या करते एक समय पर कितनों मरीजों की देखभाल करते, दवाई देने के लिए भी केवल एक नर्स के हवाले पूरा वार्ड होता है। 13 अप्रैल को उनकी मां को वेंटिलेटर पर रखा गया और कुछ देर बाद ही दम तोड़ दिया।

खुद भी हो गए संक्रमित

घर आने के बाद वो खुद कोरोना से संक्रमित हो गए। उनके भाई-भाभी और बच्चों समेत पूरा परिवार संक्रमित हो गया। इस बीच ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर भी नहीं मिल रहा था, समाजसेवी सुमित शर्मा से संपर्क करने के बाद 20 मिनट के भीतर उनके पास ऑक्सीजन कन्सट्रेटर पहुंच गया और काफी दिन तक कंस्ट्रेटर के सहारे जिंदा रहे। हरमीत से सरकार से मांग की है कि सिस्टम को दूरूस्त करने की जरूरत है, जो कमियां हैं उन्हें जल्द दूर करना चाहिए। साथ ही लोगों से कहा कि सकारात्मक सोच और हिम्मत से कोरोना को हराया जा सकता है।

आईजीएमसी का इंकार

आईजीएमसी के प्रिंसिपल रजनीश पठानिया ने कहा कि अप्रैल माह में ऐसी स्थिति नहीं थी। अस्पताल में स्टाफ की कमी जरूर है लेकिन कोविड वार्ड में जरूरत के हिसाब से डॉक्टर पैरा मेडिकल स्टाफ समेत अन्य स्टाफ की तैनाती की गई है। मरीजों को ठीक करने और देखभाल के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक मरीज का डाइपर बदलने से लेकर खाने खिलाने,जांच करने, ऑक्सीजन देने और दवाई देने तक काफी समय लग जाता है। किसी मरीज को शौचालय तक ले जाना होता है तो वॉर्ड बॉय शौचालय के बाहर खड़ा रहता है। मरीजों की संख्या ज्यादा है, इसलिए कई बार मरीज तक पहुंचने में देरी हो जाती है। अस्पताल का हर कर्मी मरीजों की जान बचाने के लिए जी-जान से जुटा है। शुक्रवार को आईजीएमसी में दाखिल कोरोना मरीजों की संख्या 292 थी। हर रोज मामले बढ़ने के साथ साथ मरीजों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। उन्होंने बताया कि दवाइयों से लेकर सभी तरह के खर्चों को जोड़ें तो एक मरीज पर प्रतिदिन औसतन 10 हजार रुपये का खर्च आ रहा है।

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