Health News: जनवरी का महीना गर्भाशय ग्रीवा कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। भारत में यह कैंसर महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों का प्रमुख कारण है। यह महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। सही समय पर टीकाकरण और जांच से इसे पूरी तरह रोका जा सकता है।
इस कैंसर का प्रमुख कारण ह्यूमन पैपिलोमा वायरस है। एचपीवी वैक्सीन को लेकर समाज में कई गलतफहमियां फैली हुई हैं। ये भ्रांतियां उपचार में देरी का कारण बनती हैं। हमने सीके बिरला अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. तृप्ति रहेजा से बात कर इन मिथकों की सच्चाई जानी।
मिथक एक: वैक्सीन सिर्फ सेक्सुअली एक्टिव महिलाओं के लिए है
डॉ. रहेजा के अनुसार यह मिथक पूरी तरह गलत है। एचपीवी वैक्सीन हर उस महिला पर प्रभावी है, जिसे वायरस के संपर्क में आने से पहले लगाया गया हो। इस वैक्सीन को लगाने की आदर्श उम्र 9 से 14 वर्ष है। इस उम्र में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सबसे मजबूत होती है।
इस आयु वर्ग में वैक्सीन की सिर्फ दो खुराक लगती हैं। यह वैक्सीन 26 वर्ष तक और कुछ मामलों में अधिक उम्र की महिलाओं को भी लाभ दे सकती है। यह उनके व्यक्तिगत जोखिम कारकों पर निर्भर करता है। वैक्सीन का लाभ उम्र से अधिक संक्रमण की स्थिति से जुड़ा है।
मिथक दो: वैक्सीन लेने से बच्चे जल्दी सेक्स करने लगेंगे
डॉक्टर कहती हैं कि इस मिथक का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह वैक्सीन एक निवारक स्वास्थ्य उपाय है। यह बचपन या किशोरावस्था में लगाए जाने वाले अन्य टीकों जैसी ही है। इसका उद्देश्य बीमारी को होने से रोकना है, न कि किसी के व्यवहार को प्रभावित करना।
अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पता चला है कि वैक्सीनेशन और यौन व्यवहार के बीच कोई संबंध नहीं है। टीकाकरण एक चिकित्सीय सुरक्षा है। यह यौन शिक्षा का विकल्प नहीं है। दोनों को अलग-अलग समझने की आवश्यकता है।
मिथक तीन: शादी या बच्चे होने के बाद वैक्सीन बेकार है
वैक्सीन मौजूदा एचपीवी संक्रमण को ठीक नहीं कर सकती। लेकिन यह उन वायरस प्रकारों से सुरक्षा प्रदान करती है, जिनसे महिला अभी तक संक्रमित नहीं हुई है। शादीशुदा या मातृत्व प्राप्त महिलाएं भी इससे लाभान्वित हो सकती हैं।
यह वैक्सीन भविष्य में होने वाले नए संक्रमणों से बचाती है। इसलिए उम्र के बजाय संक्रमण की स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य इतिहास और जोखिम कारकों के आधार पर चिकित्सक सलाह देते हैं।
वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर चिंताएं
डॉ. तृप्ति बताती हैं कि अक्सर अभिभावक वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। दुनिया भर में इसकी करोड़ों खुराकें लगाई जा चुकी हैं। एचपीवी वैक्सीन को सुरक्षित, प्रभावी और सहनशील माना गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसकी सिफारिश करता है।
भारत में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जांच दर अभी भी कम है। ऐसे में एचपीवी वैक्सीन भविष्य में कैंसर के बोझ को कम करने का एक बड़ा अवसर है। यह वैक्सीन जांच का विकल्प नहीं है। इसे एक पूरक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए।
कौन ले सकता है एचपीवी वैक्सीन
नौ से चौदह साल की आयु के बच्चे इस वैक्सीन के प्राथमिक लाभार्थी हैं। पंद्रह से छब्बीस वर्ष की किशोरियां और युवतियां भी इसे ले सकती हैं। जिन महिलाओं को पहले एचपीवी संक्रमण नहीं हुआ है, वे भी लाभ उठा सकती हैं।
सही जानकारी और समय पर टीकाकरण से इस कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। यह महिलाओं को स्वस्थ जीवन जीने में मदद करेगा। जागरूकता फैलाना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
