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हिमाचल प्रदेश पंचायत चुनाव: सरकार ने अदालत में कहा, पुनर्सीमांकन में लगेंगे छह महीने, याचिकाकर्ता का आरोप- जानबूझकर हो रही देरी

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को समय पर कराने की मांग को लेकर सुनवाई जारी है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार चुनाव कराने में अपाहिज महसूस कर रही है। मामले की अगली सुनवाई अब छह जनवरी को होगी।

शिमला में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर लगभग दो घंटे तक सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की पीठ सुनवाई पूरी न होने पर छह जनवरी को फिर मामले की सुनवाई करेगी। पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल जनवरी में समाप्त हो रहा है।

राज्य सरकार ने अदालत में चुनाव में देरी का कारण पंचायत और जिला परिषद वार्डों के पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया बताई है। सरकार ने दलील दी कि इस प्रक्रिया को पूरा होने में कम से कम छह महीने का समय लगेगा। इस आधार पर सरकार ने चुनाव समय पर कराना संभव नहीं बताया है।

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हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष का दावा है कि सरकार जानबूझकर चुनाव कराने में आनाकानी कर रही है। उन्होंने अदालत को बताया कि जिस पुनर्सीमांकन अधिसूचना को आधार बनाया जा रहा है, वह केवल शिमला जिले से संबंधित थी। एक अन्य खंडपीठ द्वारा उस अधिसूचना को पहले ही निरस्त कर दिया गया है।

अदालत ने इस पूरे मामले में गंभीरता दिखाई है। पीठ ने स्पष्ट कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार चुनाव करवाने के मामले में अक्षमता जता रही है। कोर्ट ने पहले ही राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा था।

इस मामले में दायर जनहित याचिका में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव समय पर कराने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं है।

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पंचायत चुनाव प्रक्रिया पूरे राज्य की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था का आधार है। इन चुनावों में देरी से ग्रामीण विकास की योजनाओं और कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत का निर्णय राज्य के ग्रामीण राजनीतिक परिदृश्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा।

छह जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होगी। अदालत राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग की दलीलों पर गौर करेगी। साथ ही याचिकाकर्ता के आरोपों पर भी विचार करेगी।

पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अगर नए चुनाव नहीं होते हैं तो प्रशासनिक अड़चनें पैदा हो सकती हैं। ग्रामीण स्तर पर विकास कार्य रुक सकते हैं। इसीलिए इस मामले में त्वरित निर्णय की आवश्यकता है।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का अंतिम फैसला पंचायती राज व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि स्थानीय निकायों के चुनाव किसी भी स्थिति में समय पर संपन्न हों। इससे लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी।

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