Himachal News: हिमाचल प्रदेश में सरकारी नौकरी और वेतनमान को लेकर हिमाचल हाई कोर्ट ने दो बड़े फैसले सुनाए हैं। अदालत ने असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही शिक्षकों के संशोधित वेतनमान मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला उन हजारों उम्मीदवारों और कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो न्याय की आस लगाए बैठे थे।
नर्स भर्ती में नियमों की अनदेखी पर रोक
हिमाचल हाई कोर्ट की खंडपीठ ने असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती के विज्ञापन पर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा ने पाया कि यह भर्ती प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और संविधान के अनुच्छेदों के विपरीत है। अदालत ने कहा कि सरकार आवेदन स्वीकार कर सकती है, लेकिन चयन प्रक्रिया पर अगली सुनवाई तक रोक रहेगी।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इस भर्ती में आयु सीमा और आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया गया है। राज्य सरकार ने पहली बार इस पद के लिए आयु सीमा 18-45 वर्ष से घटाकर 21-32 वर्ष कर दी है। इसके अलावा, आरक्षित श्रेणियों को भी उम्र में कोई छूट नहीं दी गई है। यह भर्ती केवल 5 साल की अवधि के लिए की जा रही है, जिससे उम्मीदवारों में नाराजगी है।
सरकार को चार सप्ताह में देना होगा जवाब
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि सरकार अपनी ही पुरानी अधिसूचनाओं का उल्लंघन कर रही है। हिमाचल हाई कोर्ट ने प्रतिवादी सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 26 फरवरी को तय की गई है। तब तक चयन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी। आवेदन करने की अंतिम तिथि 16 जनवरी ही रहेगी।
शिक्षकों को मिला संशोधित वेतनमान का हक
दूसरी ओर, हिमाचल हाई कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में एक और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पुराने नियमित शिक्षकों को संशोधित वेतनमान नहीं दिया जा रहा था। न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ ने स्पष्ट किया कि 2022 के वेतन नियमों का लाभ सभी पात्र कर्मचारियों को मिलेगा।
सरकार का तर्क था कि शिक्षकों को 2012 के नियमों का लाभ मिल चुका है, इसलिए वे नए वेतनमान के हकदार नहीं हैं। अदालत ने इस तर्क को आधारहीन बताया। कोर्ट ने कहा कि इंद्र सिंह ठाकुर मामले में पहले ही स्थिति स्पष्ट हो चुकी है। इसके बावजूद अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज किया, जो गलत है।
विभाग पर लगा 10 हजार का जुर्माना
अदालत ने अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताई है। स्पष्ट कानूनी मिसाल होने के बाद भी लाभ न देने पर विभाग पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। हिमाचल हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि यह राशि आईजीएमसी शिमला के ‘गरीब मरीज उपचार कोष’ में जमा कराई जाए। दो साल की नियमित सेवा पूरी करने वाले सभी शिक्षक अब संशोधित वेतनमान का लाभ ले सकेंगे।

