Himachal News: हिमाचल प्रदेश में इस बार सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। जनवरी से मार्च के बीच सामान्य से पचपन प्रतिशत कम बारिश और बर्फबारी का अनुमान है। जनवरी में न्यूनतम और अधिकतम दोनों तापमान सामान्य से अधिक रह सकते हैं। इसका सीधा असर जल स्रोतों और रबी फसलों पर पड़ेगा।
पिछला नवंबर और दिसंबर महीना पूरी तरह सूखा बीता है। नवंबर में सामान्य से छियानवे प्रतिशत कम बारिश हुई। दिसंबर में यह कमी निन्यानवे प्रतिशत तक रही। अब आने वाले तीन महीने भी सूखे की आशंका से ग्रस्त हैं।
कृषि और पर्यटन पर प्रभाव
बारिश की कमी का सीधा असर राज्य की कृषि पर पड़ेगा। रबी की फसलों के लिए पर्याप्त नमी नहीं मिल पाएगी। इससे उत्पादन में कमी आ सकती है और किसानों को नुकसान हो सकता है।
पर्यटन व्यवसाय भी इस मौसमी बदलाव से प्रभावित होगा। बर्फबारी कम होने से स्कीइंग और बर्फ पर्यटन को झटका लग सकता है। होटल और ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोगों का व्यवसाय प्रभावित होगा।
किन जिलों में है शीतलहर का अलर्ट
मौसम केंद्र शिमला ने कई जिलों के लिए पीला अलर्ट जारी किया है। ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, कांगड़ा और मंडी जिले इसकी जद में हैं। इन क्षेत्रों में शीतलहर चलने और कड़ाके की सर्दी पड़ने की चेतावनी दी गई है।
छह जनवरी तक इन जिलों में घने कोहरे की भी आशंका है। इससे रात से सुबह दस बजे तक दृश्यता पचास मीटर तक गिर सकती है। यातायात और दैनिक जीवन प्रभावित होने की संभावना है।
राज्य के तापमान में उतार-चढ़ाव
ताबो में न्यूनतम तापमान शून्य से छह दशमलव आठ डिग्री नीचे दर्ज किया गया। कुकुमसेरी, कल्पा, कुफरी और नारकंडा में भी पारा शून्य से नीचे पहुंच गया है। हालांकि शिमला में धूप खिली हुई है लेकिन ठंड का प्रकोप बना हुआ है।
लाहौल-स्पीति जिले और किन्नौर के कुछ हिस्सों में सामान्य बारिश की संभावना जताई गई है। यह इलाके राज्य के अन्य भागों से अलग मौसमी स्थिति का अनुभव कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर मौसम में भिन्नता देखी जा सकती है।
मौसम विभाग का पूर्वानुमान
मौसम केंद्र शिमला के वैज्ञानिक संदीप शर्मा ने ताजा जानकारी दी है। उनके अनुसार जनवरी में कड़ाके की ठंड अपेक्षाकृत कम रहेगी। तापमान सामान्य से अधिक रहने के आसार हैं।
जनवरी से मार्च के बीच सामान्यतः एक सौ चौरासी मिलीमीटर बारिश होती है। इस बार इससे काफी कम वर्षा होने का अनुमान है। यह स्थिति पूरे राज्य के लिए चिंता का विषय बन गई है।
भविष्य की चुनौतियां
जल स्रोतों में पानी का स्तर गिरने से गर्मियों में पेयजल संकट उत्पन्न हो सकता है। नदियों और झरनों का प्रवाह कम हो जाएगा। इससे पनबिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।
किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाएगा। बागवानी फसलों जैसे सेब पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। राज्य सरकार को इन चुनौतियों के लिए पहले से तैयारी करनी होगी।
मौसम में इस बदलाव के कारणों का अध्ययन किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि का इस पर प्रभाव हो सकता है। दीर्घकालिक समाधान के लिए व्यापक योजना बनाने की आवश्यकता है।
