Himachal News: हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भविष्य के नेतृत्व को लेकर कयासों का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और युवा मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बीच सियासी समीकरणों पर सबकी नजर टिकी है। राजनीतिक विश्लेषक अब 2032 के सियासी ढांचे का गुणा-भाग करने में जुटे हैं। वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले दशक में पहाड़ की राजनीति का असली ‘राजा’ कौन होगा।
अधिकारियों पर बयान से बंटी कांग्रेस
हाल ही में लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने बाहरी राज्यों (बिहार-यूपी) के अधिकारियों को लेकर एक बयान दिया था। इस बयान ने सियासी पारा चढ़ा दिया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी और तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्मानी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। हालांकि, इस विवाद के बीच शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने खुलकर विक्रमादित्य का समर्थन किया। इससे यह साफ हो गया है कि कैबिनेट के भीतर विक्रमादित्य अकेले नहीं हैं और उन्हें पार्टी के एक धड़े का मजबूत साथ मिल रहा है।
पिता के बाद बदल गए तेवर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद परिस्थितियां बदली हैं। पिता का साया उठते ही राजनीति की राह कठिन हो गई है। जो नेता कभी वीरभद्र सिंह के वफादार माने जाते थे, आज वही उनके बेटे को चुनौती दे रहे हैं। इसके बावजूद विक्रमादित्य सिंह अपनी बेबाक और पारदर्शी कार्यशैली पर कायम हैं। वह दबाव में आए बिना अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे हैं।
उम्र का फासला और भविष्य का गणित
हिमाचल की सत्ता का भविष्य उम्र के गणित पर भी निर्भर करेगा। वर्तमान में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू 61 वर्ष के हैं। वहीं, विक्रमादित्य सिंह अभी महज 35 वर्ष के युवा नेता हैं। साल 2032 तक सीएम सुक्खू 68 वर्ष के हो जाएंगे, जबकि विक्रमादित्य 42 वर्ष के होंगे। विक्रमादित्य के पास एक लंबी सियासी पारी खेलने का पूरा मौका है। विश्लेषकों का मानना है कि जो लोग आज विक्रमादित्य को कमजोर समझ रहे हैं, उन्हें भविष्य में चौंकाने वाले परिणाम देखने को मिल सकते हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव इस सत्ता संघर्ष में निर्णायक साबित होंगे।
