Himachal News: हिमाचल की पंचायतों में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राज्य के इतिहास में पहली बार हिमाचल प्रदेश की पंचायतों की बागडोर चुने हुए प्रधानों के बजाय अफसरों (प्रशासकों) के हाथ में जा सकती है। सुक्खू सरकार ने आपदा एक्ट के चलते पंचायत चुनाव फिलहाल टाल दिए हैं। ऐसे में 31 जनवरी के बाद पंचायतों का काम कैसे चलेगा, इसे लेकर सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। जनवरी के बाद प्रदेश में एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल होना तय माना जा रहा है।
31 जनवरी को खत्म हो रहा है कार्यकाल
आमतौर पर हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव दिसंबर के अंत तक निपट जाते थे। जनवरी के पहले हफ्ते में नई पंचायतें शपथ लेकर काम शुरू कर देती थीं। लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। मौजूदा पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 31 जनवरी को पूरा हो रहा है। चुनावी कैलेंडर बिगड़ने के कारण 1 फरवरी से नई व्यवस्था लागू करना सरकार की मजबूरी बन गई है। सरकार अभी कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है कि संवैधानिक संकट से कैसे बचा जाए।
सरकार के पास बचे हैं सिर्फ दो विकल्प
सूत्रों की मानें तो हिमाचल प्रदेश सरकार के पास अब मुख्य रूप से दो ही रास्ते बचे हैं। पहला विकल्प यह है कि पंचायतों का पूरा जिम्मा सरकारी प्रशासकों (Administrator) को सौंप दिया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि मौजूदा प्रधानों और सदस्यों का कार्यकाल कुछ समय के लिए बढ़ा दिया जाए। सरकार के भीतर इन दोनों विकल्पों पर गंभीरता से मंथन चल रहा है। अगर प्रशासक नियुक्त किए जाते हैं, तो यह प्रदेश के इतिहास में पहली बार होगा जब बिना चुने हुए प्रतिनिधियों के पंचायतें चलेंगी।
कैबिनेट की बैठक पर टिकी सबकी नजरें
अब पूरे प्रदेश की निगाहें आगामी कैबिनेट बैठक पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही इन विकल्पों में से किसी एक पर अंतिम मुहर लगा देगी। वैसे तो देश के अन्य राज्यों में प्रशासक लगाने या कार्यकाल बढ़ाने की परंपरा रही है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में ऐसा वाकया पहली बार होगा। सरकार का प्रयास है कि चुनाव टलने के बावजूद गांवों में विकास की रफ्तार न थमे।
