आजादी के लिए लड़ने वालों को भूल चुके सरकार, नहीं हुआ आज तक स्वतंत्रता सेनानियों की सूचि में नाम दर्ज


करसोग। अगर कोई राष्ट्र अपने स्वतंत्रता सेनानियों को ही भूलने लगे तो वह किस दिशा में जा रहा है यह सोचने का विषय है। जिनकी बदौलत हमें अंग्रेजों और राजाओं के शोषण से आजादी मिली हम उन्हीं को भूलते जा रहे हैं। ऐसे ही आजादी के भूले-बिसरे नायक है करसोग उपमंडल के गांव भनेरा के दो क्रांतिकारी ताती राम और न्हारू राम।

पेशे से प्राइवेट अध्यापक अपने गांव के स्वतंत्रता सेनानियों पर खोज कर रहे मनदीप कुमार का कहना है कि हिमाचल प्रदेश की सुकेत रियासत के राजाओं का शासन बेहद क्रूर और आम जनता का शोषण करने वाला रहा है। 8वीं शताब्दी में बंगाल से आए सेन वंशी राजाओं ने यहां पर निवास करने वाली डूंगर जाति नरसंहार कर अपनी रियासत की स्थापना की थी। स्थानीय राजाओं, ठाकुरों को उन्होंने आपसी फूट के कारण हरा दिया था। लगभग 1300 सालों सुकेत रियासत में राजाओं का शासन रहा। इसके खिलाफ बहुत सारे लोग लड़े, इन्हीं में सो दो विद्रोही क्रांतिकारी हुए हैं भनेरा गांव के तांती राम और न्हारू राम, जिनका जिक्र न तो हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी पुस्तक में है न उनको कभी स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र मिला।

क्रांतिकारी ताती राम, गांव भनेरा.

राजा के शोषण अत्याचार से तंग आकर सुकेत रियासत की जनता ने 1948 में सुकेत विद्रोह का बिगुल फूंका था। इस में भाग लेने वाले क्रान्तिकारी तांती राम सुपुत्र आल्मु राम और न्हारू राम सुपुत्र अछरु राम का जन्म भनेरा नामक गांव में हुआ था। यह गांव मंडी जिला, तहसिल करसोग में पड़ता है। जहां समाज में छुआछूत चरम सीमा पर थी वहीं राजा और उनके प्यादों की बेगारी ने इन लोगों का दम तोड़ दिया था। राजा के अत्याचारों से तंग आ कर इन्होंने राजशाही से लोहा लेने की ठान ली और बड़े होने पर दोनों ने समय-समय पर सुकेत सत्याग्रह से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। दोनों सुकेत प्रजामंडल के सदस्य बन गए।

इसी बीच राजा के प्यादों द्वारा राजा की पुलिस को दोनों की गतिविधियों की सुचना दी। सुचना पाकर दोनों को पकड़ने के लिए सब-इंस्पेक्टर लाला मंगत राम ने दो-दो सिपाही भेजे। सिपाहियों को दोनों ने मार-मार कर भगा दिया। फिर पुनः थानेदार ने और सिपाही हथकड़ी लेकर भेजे परन्तु उन्हें भी उन दोनों ने मार भगाया और उनकी हथकड़ीयों को अपने घर की शहतीरों में टांग दिया। इस से तंग आ कर थानेदार ने हथियारबंद सिपाही भेजे और दोनों को गिरफ्तार कर लिया। कुछ समय बाद दोनों को जमानत पर छोड़ दिया गया और उन पर नजर रखी गयी।

कुछ समय बाद सुकेत विद्रोहियों का एक जथा केलोधार-बखरुनडा होता हुआ जरोडादड नामक (वर्तमान में महाविद्यालय करसोग) स्थान पर इकठा हो गया। इस में लगभग 250 लोग थे जिसमें तांती राम और न्हारू राम भी शामिल थे। इन दोनों को पुलिस ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1947 के अधीन हिरासत में ले लिया। इस केस में “थाना करसोग रियासत सुकेत” की रिपोर्ट संख्या 24 72004 में इन दोनों को 15 -15 दिन की सजा हुई जो की करसोग मजिस्ट्रेट द्वारा सुनाई गयी। इस में इन दोनों को बाकि लोगों के साथ सुन्दरनगर जेल भेज दिया गया। 15 दिन के कारावास दोनों 02 -11 -1947 से 16-11-1947 तक जेल में रहे वहाँ पर इन दोनों को बहुत यातनायें दी गयी।

गांव के बुजुर्गों मदन लाल, घोलू राम, मान दास और ओमप्रकाश उर्फ काशी का कहना है कि न्हारू राम को काँटों पर सुलाया गया और उनकी पीठ पर सिपाही चलवाए गए जिसकी वजह से न्हारू राम की मृत्य जेल से आने के 3 वर्ष के भीतर ही हो गयी थी। जेल से रिहा होने के बाद भी दोनों आंदोलन से जुड़े रहे तथा सरकारी रिकोर्ड के अनुसार 16-11-1947 से 15-02-1948 तक दोनों भूमिगत हो गए और दोनों चुपचाप अपनी गतिविधियों में लगे रहे। साथ ही श्री यशवंत परमार जी के सम्पर्क में जुड़े रहे।

इन दोनों ने तभी चैन की साँस ली जब सुकेत रियासत भारत का अंग बन गयी और राज-शाही से मुक्ति मिल गयी। 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल अस्तित्व में आया परन्तु समाज की चालाकियों से कोसों दूर दोनों सत्याग्रही अपना नाम स्वतंत्रता सेनानियों में दर्ज तक नहीं करवा पाए।

नगर पंचायत करसोग के अध्यक्ष बंसी लाल कौंडल ने दुख जताते हुए कहा कि आज तक भी इन दोनों परिवारों को किसी भी तरह का न तो सम्मान दिया गया और न ही इनका नाम सत्याग्रहीयों में शामिल किया गया, जबकि इनकी गवाही खुद नामजद सत्याग्रहीयों ने दी है और गाँव के बड़े बुजुर्गों से आज भी आप इनके बारे में सुन सकते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों में अपना नाम जुड़वाने के लिए दोनों ने 1985 में मंडी जिला उपायुक्त को अपने दस्तावेज सौंपे थे, लेकिन दुर्भाग्य से इनका नाम नहीं शामिल हो सका, इसके बाद 2005 में इनके परिजनों ने फिर अपने दस्तावेज सरकारी अधिकारियों के भेजे लेकिन प्रशासन ने इनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया। जीते जी सरकार ने इनको जो सम्मान नहीं दिया कम से कम मरने के बाद तो सरकार द्वारा इन की सुध ली जानी चाहिए।

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