पुलिस प्रोटेक्शन में निकली आरक्षण, कानून और संविधान की अर्थी, भीम आर्मी के पदाधिकारी बैठे धरने पर

हिमाचल प्रदेश में आज बेहद शर्मनाक घटना हुई, जिसके चलते देवभूमि पूरे विश्व के सामने शर्मसार हो गई। यह शायद भारत के इतिहास की पहली घटना है , जब संविधान और कानून की अर्थी एक विधानसभा के परिसर में सजाई और निकाली गई। बाकायदा कानून को काला कानून बता कर नारे लगाए गए और रश्मों रिवाज के साथ अर्थी को ले जाया गया। पुलिस और प्रशासन ने मौके पर मौजूद होने के बाबजूद कोई भी कानूनी कार्यवाही नही की। यहां एक ओर स्वर्ण आयोग की मांग करने वालों ने संविधान, कानून और संवैधानिक प्रावधानों की अर्थी निकाली और उधर भीम आर्मी के बैनर के तले प्रदेश के बहुत से दलित संगठनों ने इस घटना का विरोध भी किया।

जानकारी के मुताबिक स्वर्ण आयोग की मांग करने वालों ने पहले घोषणा की थी कि वह यह अर्थी अम्बेडकर चौक से डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर की मूर्ति के नीचे से निकाली जाएगी। लेकिन भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों के लोगों द्वारा वहां इकठ्ठा होने के चलते देव भूमि क्षत्रिय संगठन के अध्यक्ष रुमित सिंह ठाकुर के नेतृत्व में विधानसभा परिसर में अर्थी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

यहां पुलिस, प्रशासन और सरकार की भूमिका संदिग्ध है। जिस विधानसभा में कोई भी नही घुस सकता। हर वक्त सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद पुलिस मजबूती से घुसने वालों को रोकती है, वही इस तरह संविधान और आरक्षण की अर्थी सज जाना पुलिस, प्रशासन और सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े करती है। इस घटना से साफ संदेश मिल रहा है कि हिमाचल में सरकार संविधान, संवैधानिक व्यवस्थाओं और कानून की रक्षा करने में नाकाम है।

भीम आर्मी ने शव यात्रा निकालने पर शुरू किया डीसी ऑफिस में धरना

इस मामले में भीम आर्मी के प्रदेशाध्यक्ष रवि कुमार दलित ने सरकार, पुलिस और प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह सब मिली भगत से अंजाम दिया गया काम है, सरकार संविधान के खिलाफ काम कर रही है। इसलिए सरकार की नाक के नीचे संविधान, आरक्षण और कानून की अर्थी निकल गई। जानकारी के मुताबिक भीम आर्मी के बैनर तले सभी दलितसंगठनों के पदाधिकारी डीसी ऑफिस शिमला में धरने पर बैठ गए है। तथा उन्होंने मांग की है कि जब तक संविधान, कानून और आरक्षण की अर्थी निकालने वालों के खिलाफ कार्यवाही नही करते वह वहां से नही उठेंगे।

अंतिम रिपोर्ट मिलने तक उपायुक्त शिमला भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों के पदाधिकारियों को जांच और पुलिस रिपोर्ट के नाम पर गुमराह करते नजर आए है। उन्होंने कहा कि पहले रिपोर्ट आ जाए उसके बाद कार्यवाही करेंगे। जबकि दलित संगठनों के पदाधिकारियों ने बाकायदा सभी वीडियो और मीडिया रिपोर्ट्स दिखाई। अब देखना यह होगा कि कानून और संविधान की रैली निकालने पर सरकार, प्रशासन और पुलिस क्या एक्शन लेती है। यहां से पूरी तरह तय हो जाएगा कि हिमाचल प्रदेश का प्रशासन, पुलिस और सरकार संविधान की रक्षा में खड़े है या फिर संविधान के खिलाफ।

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