Kullu Dashahara: लंका दहन और रथयात्रा की वापसी के साथ कुल्लू का अंतरराष्ट्रीय दशहरा संपन्न

विश्व प्रसिद्ध सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा (Kullu Dussehra Festival) उत्सव संपन्न हो गया है. रावण की लंका जलाई गई और बुराई का अंत करके अच्छाई पर जीत पाई. दोपहर बाद ढालपुर मैदान से रथ यात्रा लंका बेकर की और प्रस्थान कर गई. उसके बाद जय श्री राम के जय घोष के साथ रथ यात्रा वापिस ढालपुर मैदान पहुंची. वहीं, भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर वापिस अपने मन्दिर पहुंचे.

भगवान रघुनाथ, सीता, हनुमान और अन्य देवताओं की मूर्तियों को सुंदर ढंग से सजाए गयए लकड़ी के रथ पर रखा गया था, जिसे हजारों भक्तों ने खींचा. उत्सव में भाग लेने वाले देवताओं की पालकी यात्रा के दौरान रथ के साथ थी. इससे पहले 2014 से पहले, लंका बेकर में त्योहार की परिणति पर देवी काली को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न जानवरों की बलि दी जाती थी. यह रावण और उसके सहयोगियों के अंत का प्रतीक माना जाता था.

अब नहीं दी जाती जानवरों की बलि

परंपरा के अनुसार, एक भैंस, एक भेड़ का बच्चा, एक मछली, एक केकड़ा और एक मुर्गे की बलि दी जाती थी, लेकिन 2014 हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार्मिक स्थानों और सभाओं में पशु बलि पर प्रतिबंध के बाद नारियल और अन्य चीजों की पेशकश करके अनुष्ठान किया जाता है. कुल्लू के दशहरे में खास बात यह है कि यहां पर रावण के पुतले को नहीं जलाया जाता, बल्कि गोबर से रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतले बनाए जाते हैं और फिर तीर भेदने के बाद आग लगाई जाती है.

इससे पहले दिन के समय कुल्लू के राजा सुखपाल में बैठकर ढालपुर के कलाकेंद्र मैदान में पहुंचे और महाराजा के जमलू, पुंडीर देवता नारायण व वीर देवता की दराग और रघुनाथ जी की छड़ व नरसिंह भगवान की घोड़ी भी राजा के साथ कला केंद्र मैदान पहुंची, जहां खड़की जाच का आयोजन हुआ. देवी हिडिंबा के आने के बाद ढालपुर मैदान में रथयात्रा का शुभारंभ किया गया और लंका बेकर में भी पुरातन परंपराओं का निर्वहन किया गया.

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