हिमाचल में आउटसोर्स कर्मचारियों के ईपीएफ के 200 करोड़ का गोलमाल, बड़े भ्रष्टाचार की आशंका

हिमाचल में आऊटसोर्स कर्मचारियों के करोड़ों रुपए सेवा प्रदाता कंपनियों पर हड़पने के आरोप लग रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक बीते कुछ वर्षों के दौरान ईपीएफ व ईएसआई के नाम पर कंपनियों ने 200 करोड़ रुपए से अधिक की रकम हड़प ली है। आऊटसोर्स कर्मियों के मानदेय से हर महीने 2500 से 5000 रुपए तक प्रतिमाह ईपीएफ व ईएसआई के नाम पर काटा जा रहा है लेकिन कई कंपनियां यह पैसा कर्मचारियों के खाते में नहीं डाल रही हैं। कुछ कंपनियां तो ऐसी भी हैं जो सालों से कर्मचारियों को ईपीएफ नंबर और ईएसआई कार्ड नहीं दे पाई हैं। फिर सवाल उठना लाजिमी है कि ईपीएफ और ईएसआई के नाम पर सालों से काटा गया पैसा आखिर कहां गया?

अधिकतर कंपनियों ने ईपीएफ का पैसा जमा ही नहीं करवाया

हिमाचल विद्युत बोर्ड कर्मचारी महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप खरवाड़ा ने बताया कि वर्ष 2015 से 2018-19 तक बिजली बोर्ड में अधिकतर कंपनियों ने आऊटसोर्स कर्मचारियों के ईपीएफ का पैसा जमा ही नहीं करवाया है। महासंघ ने कई बार विद्युत बोर्ड प्रबंधन से इसकी जांच की मांग की, लेकिन कंपनियों पर कार्रवाई की बोर्ड प्रबंधन हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है। हालांकि महासंघ के दबाव में वर्ष 2018-19 के बाद से कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों का ईपीएफ  काटना शुरू कर दिया है। उन्होंने बिजली बोर्ड के अलावा दूसरे विभागों में भी ईपीएफ व ईएसआई के नाम पर गबन की गई राशि की जांच मांगी है। कुछ ऐसा ही हाल महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत आऊटसोर्स कर्मचारियों का है। ऐसा ही राज्य सरकार के अधिकतर विभागों, बोर्ड व निगमों में बड़ी संख्या में आऊटसोर्स पर कर्मचारी शोषित महसूस कर रहे हैं और सेवा प्रदाता कंपनियां चांदी कूट रही हैं।

80 प्रतिशत कंपनियां नेताओं या इनके रिश्तेदारों की

राज्य में आऊटसोर्स पर कर्मचारी मुहैया कराने वाली आधा दर्जन बड़ी कंपनियां बताई जा रही हैं। इसी तरह दो दर्जन से अधिक छोटी-छोटी कंपनियां भी सरकारी विभागों, बोर्ड व निगमों को आऊटसोर्स पर कर्मचारी उपलब्ध करवा रही हैं। इनमें 80 प्रतिशत कंपनियां सत्तारूढ़ दल या कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदारों द्वारा संचालित की जा रही हैं। ऐसी रसूखदार कंपनियां ही आऊटसोर्स कर्मियों का अधिक शोषण कर रही हैं। यही कारण है कि कोई कार्रवाई नहीं हो रही और प्रदेश में लगभग 40 हजार कर्मचारी और उनके परिवार शोषित हो रहे हैं।

इस दर से कटता है ईपीएफ व ईएसआई

राज्य में 40 हजार से अधिक आऊटसोर्स कर्मचारी बताए जा रहे हैं। इनमें से अभी भी हजारों कर्मचारियों को ईपीएफ नंबर और मुफ्त चिकित्सा सुविधा के लिए ईएसआई कार्ड नहीं दिए गए, जबकि ईपीएफ  और ईएसआई के नाम पर प्रत्येक महीने मोटी रकम काट दी जाती है। 13 प्रतिशत ईपीएफ कर्मचारी का, इतना ही सेवा प्रदाता कंपनी और 3.25 प्रतिशत ईएसआई कटता है। कई कंपनियां तो ईपीएफ में 13 फीसदी शेयर जो नियोक्ता को देना होता है, वह भी कर्मचारी से ही काटा जा रहा है।

आऊटसोर्स नर्सों व वार्ड ब्वायज की भी सुध नहीं ले रही सरकार

कोविड काल में अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर दिन-रात अस्पतालों में आऊटसोर्स पर सेवाएं दे रही नर्सों व वार्ड ब्वायज पर भी सरकार का दिल नहीं पसीज रहा है। वार्ड ब्वायज को 7 से 9 हजार रुपए तथा आऊटसोर्स पर सेवाएं दे रही नर्सों को 8 से 10 हजार रुपए मानदेय दिया जा रहा है। कोविड वार्ड को छोड़कर अस्पताल की दूसरी ओपीडी में जो हैल्थ वर्कर्ज आऊटसोर्स पर काम कर रहे हैं, उनके लिए बीमा का भी कोई प्रावधान नहीं किया गया जबकि अस्पतालों में हर वक्त भीड़ के कारण इनके भी संक्रमित होने का भय बना रहता है। एनएचएम निदेशक डाॅ. निपुण जिंदल ने बताया कि कोविड में ड्यूटी देने वाले सभी हैल्थ केयर वर्कर्ज को बीमा देने की सरकार ने घोषणा कर रखी है, अन्य के बीमा का कोई प्रावधान नहीं है।

ऐसे बचेगी करोड़ों रुपए की कमीशन

आउटसोर्स कर्मचारी संघ के महासचिव अवदेश ने बताया कि ईपीएफ के नाम पर गड़बड़ी हो रही है। सेवा प्रदाता कंपनियों की मनमानी खत्म करने के लिए सरकार को चाहिए कि किसी एक सरकारी एजैंसी के माध्यम से सभी आऊटसोर्स कर्मियों की सेवाएं लें। इससे करोड़ों रुपए जो कमीशन के तौर पर कंपनियों को दिए जा रहे हैं, उसकी भी बचत होगी।    

सरकार को बनानी चाहिए कोई पॉलिसी : अनिता

आईजीएमसी की आऊटसोर्स यूनियन वर्कर का प्रधान अनिता ने बताया कि सरकार को हमारे लिए कोई पॉलिसी बनानी चाहिए या फिर वेतन में बढ़ौतरी की जाए। कोविड काल में आऊटसोर्स पर वार्ड ब्वायज सेवाएं दे रहे हैं। कुछ वार्ड ब्वायज 12 से 14 साल से ड्यूटी दे रहे हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई पॉलिसी नहीं बनाई है।

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