बैकडोर नियुक्तियाँ आरक्षित वर्गो को नौकरियों से बाहर रखने के लिए सोची समझी राजनीति

आपको याद होगा वर्ष 2003-2007 के बीच श्री वीरभधर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पीटिए एवं पैरा के नाम पर सकूलों मे शिक्षकों की भर्ती की गई| सबसे ज्यादा भर्तियाँ शिमला एवं मंडी जिला से हुई। विपक्ष मे बैठे पूर्व मुख्यमंत्री श्री प्रेम कुमार धूमल ने सत्ता से बाहर रहकर पीटिए पैरा की नियुक्तियों का विरोध किया और 2007 के विधानसभा चुनावों मे पीटिए शिक्षकों की भर्ती को मुख्य मुद्दा बनाया। बेरोजगारों ने सत्ता बदली और 2007-2012 के बीच भाजपा सरकार प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में बनी। पीटीए शिक्षक भयभीत थे कहीं बाहर न कर दिया जाए और अपने चुनावी वादे को पूरा न कर दे।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ धूमल सरकार ने पीटिए शिक्षकों को अपने चुनावी वादे के अनुसार निकालना तो दूर इनका मानदेय बड़ा दिया गया। बेरोजगार फिर ठगे गए आखिर क्यों …………….?
1. क्यों प्रेम कुमार धूमल सत्ता लेने के वाद अपने वादे से पलट गए ?
2. क्यों पीटिए शिक्षकों को उन्होने पलको पर बिठाया और उनका मानदेय बढ़ाया ?
3. क्यों सरकार मे बैठे शिक्षा मंत्री ईश्वरदास धीमान के विरोध को भी अनसुना कर दिया गया ?
4. आखिर ऐसा क्या था जिससे पीटिए शिक्षकों की नियुक्तियाँ नियमों के विपरीत होने पर भी उन्हे पाँच वर्ष धूमल सरकार के भी सुरक्षित मिल गए ?
5. आखिर क्या पैच अप हुआ पीटिए शिक्षकों और धूमल सरकार के बीच मे ?
6. आखिर क्यों रोजगार कार्यलयों मे दर्ज़ पढ़े लिखे बेरोजगार अपनी बारी का इंतज़ार करते रह गए ?
7. आखिर क्यों आरक्षित वर्गों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हुया ?

इन सब कारणों का एक ही मुख्य कारण था मात्र और मात्र आरक्षित वर्ग को बाहर करना। कांग्रेस और भाजपा सरकारों के बीच अन्य कई मुद्दों पर छ्तीस का आंकड़ा है, लेकिन आरक्षित वर्गों को नौकरियों से बाहर रखने के मुद्दे पर दोनों दलों मे एक सूत का भी फ़ासला नहीं है।

धूमल सरकार 2007-2012 के बीच में ही बैठे कुछ लोगों ने पैरा और पीटीए शिक्षकों का पक्ष रखते हुए प्रेम कुमार धूमल को बताया कि यदि इनको निकाल दिया गया, तो स्वर्ण जाति (unreserved) वालों को नौकरी में ज्यादा हिस्सा मिलने वाला नहीं है। पीटीए शिक्षक भले ही वीरभद्र सरकार ने नियुक्त किए हैं, लेकिन लगे तो 100% हमारे ही लोग है। रहने दीजिए इन्हें, बात धूमल के मन मे घर कर गई। आखिर जातिवाद का पक्ष इस देश मे कौन छोड़ता है। उस समय सरकार में बैठे शिक्षा मंत्री ईश्वरदास धीमान, जो स्वयं आरक्षित श्रेणी से थे। उन्होंने पीटिए और पैरा शिक्षक नीति का विरोध किया। लेकिन भाजपा समर्थित धूमल सरकार ने उनकी एक भी न सुनी। तत्कालीन भाजपा समर्थित धूमल सरकार पीटिए शिक्षकों को निकालने का नारा देकर सत्ता मे आई थी और पीटीए शिक्षकों को सुरक्षित करके खुद सत्ता से चली गई। जिस प्रकार 1991-92 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार ने 9000 के लगभग स्वयंसेवी अध्यापक बिना किसी रोस्टर प्रणाली को लागू किए और योग्यता को दरकिनार करके रख दिये थे। उन्होंने भी आरक्षित वर्गो को नौकरियों से बाहर रखना ही उचित समझा, चाहे वो हमेशा के लिए प्रदेश की सत्ता से बाहर हो गए। लेकिन उन्होने भी अपने वर्गों को उनकी नौकरियों से बाहर नहीं होने दिया।

आरक्षित वर्गों विशेषकर ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विरोध में सरकारी खर्च पर सुप्रीम कोर्ट तक चले गए। वर्ष 2012 में पुन: कांग्रेस सरकार वीरभद्र सिंह के नेतृत्व मे सत्ता में आई। आते ही पीटिए शिक्षकों को याद किया औए आए दिन पीटिए शिक्षकों अनुबंध में लाने का अभ्यास शुरू हो गया, आखिर क्यों ? मात्र 6-7 हज़ार पीटिए शिक्षक ही सत्ता के सूत्रधार थे, लाखों बेरोजगार नहीं ?
1. क्यों माननीय मुख्यमंत्री पीटिए शिक्षकों का ही सपना दिन रात देखते दिखाई दिये ?
2. क्यों पीटिए शिक्षक नेता प्रदेश भर के 6-7 हज़ार शिक्षकों से 1000 तो कभी 500 रुपए चंदा लेकर लाखो रुपए कहाँ ले जाते। मान लो 6000 पीटिए शिक्षक में से 5000 शिक्षक 1000/रुपए चंदा दे तो एक बार में 50 लाख रुपए बन जाते है। आखिर कहाँ जाते है यह रुपए, कई बार ऐसे चंदे जमा हुए।

हमें बोलने की जरूरत नहीं है, क्या पीटिए शिक्षकों और सरकारों के बीच सौदेबाजी चलती रही? क्यों, सरकारे नियमों की धज्जियां उड़ा कर मात्र और मात्र असंवैधानिक नियुक्तियों को ही सर्वोपरि मान कर आरक्षित वर्गों के खिलाफ षड्यंत्र रचती रही ?

1. क्यों आरक्षित वर्गों को बार बार बैकलॉग का रोना रो कर न्यालय से न्याय लेना पड़ रहा है ? क्या आरक्षित वर्ग वोट डाल कर सरकार नहीं चुनता?

2. क्यों सरकारें देश के संविधान को नही मानती?

3. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग हजारों पद पैरा और पीटिए शिक्षकों से भरे जाने थे अगर यह नियुक्तियाँ रोस्टर ऑर रोजगार कार्यालयों के माध्यम से नियमानुसार हुई होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वर्तमान सरकार इसी रास्ते पर चल कर पीटीए का डाला हुआ नाम एसएमसी के नाम पर नियुक्तियाँ शुरू कर दी, साथ ही सभी पीटीए नियुक्तियों को सही मानते हुए उनको स्थाई होने का दर्जा देकर अपने चहेतों को उसका फायदा दिया। अब जो smc की नई नियुक्तियां की वहाँ भी कोई रोस्टर नहीं कोई रोजगार कार्यलय का नाम नहीं अर्थात फिर वही चल की कैसे आरक्षित वर्ग को बाहर किया जाए।

आरक्षित वर्गों जागो, उठो संभल जाओ वरना आज की सरकारे अँग्रेजी हकुमत की से बदतर हमारे लिए काम कर रही है। सत्ता के मठाधीश हमें हमारे संविधानिक अधिकारों से वंचित रखकर हमारे साथ देश के नागरिकों की तरह व्यवहार न करके, विदेशियों की तरह व्यवहार करने पर उत्तारु हो गई है। इस देश का मूलनिवासी जो आज आरक्षित वर्ग होकर भिखारियों की तरह कुछ मिलने की रह ताक रहा है, समय आ गया है अपने अधिकारो के लिए लड़ने का –जागो उठो, चिन्तन करो और अपने ही देश में गैर होकर जीने से बेहतर है, अपने हक के लिए बाहर निकल आओ। वरना अंदर ही अंदर इन सरकारों द्वारा कुचल दिए जाओगे।

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