बागवानों को लूट रहे आढ़ती और कारोबारी, अब तक हो चुका है 250 करोड़ का घोटाला

हिमाचल की चार से पांच हजार करोड़ रुपये की सेब की सालाना आर्थिकी पर आढ़तियों और कारोबारी की लूट भारी पड़ रही है। एक दशक में सेब की खरीद के नाम पर करीब ढाई सौ करोड़ का गड़बड़झाला हुआ है।

बागवानों को फसल के दाम एक साल बाद भी नहीं मिल पा रहे हैं। यह मुद्दा विधानसभा के सदन से लेकर सड़क तक गूंज चुका है। बावजूद इसके बागवानों से ठगी नहीं थम रही है। सेब के गिरते दामों के बीच अगर कारोबार की असलीयत की जांच की जाए तो पता चलेगा कि बागवानों को आढ़ती से लेकर कारोबारी हर साल चूना लगा रहे हैं। दो वर्ष से लूट के इन मामलों की जांच सीआइडी की एसआइटी कर रही है, लेकिन अभी भी इसकी रोकथाम के लिए स्थायी तंत्र विकसित नहीं हो पाया है।

कृषि उपज मंडी समिति (एमपीएमसी) अपनी सही भूमिका निभाने में नाकाम रही है। एपीएमसी एक्ट 2005 का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। इस एक्ट के अनुसार जिस दिन मंडी में सेब बिकता है, उसी दिन बागवान को इसकी अदायगी करनी होती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक्ट कहता है कि एपीएमसी उत्पाद को जब्त कर इसकी नीलामी कर इससे प्राप्त पैसों का भुगतान बागवान को करें। खरीदारों से बैंक गारंटी लें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। कायदे से अगर कहीं बागवानों से धोखाधड़ी हुई तो इसकी पुलिस में शिकायत एपीएमसी को करनी चाहिए। लेकिन सारी की शिकायतें और एफआइआर प्रभावित बागवानों ने खुद की हैं।

112 केस हुए दर्ज

एसपी सीआइडी एवं एसआइटी प्रमुख वीरेंद्र कालिया ने कहा कुल मिलाकर गड़बड़झाला 100 करोड़ का होगा। दो साल से जांच कर रहे हैं। कुल 112 केस दर्ज हैं। अधिकांश मामलों में रिकवरी हो गई है। 20 करोड़ से अधिक की रिकवरी आन रिकार्ड है। अगर मौखिक शिकायतों पर हुई कार्रवाई को भी जोड़े तो वापस लौटाई रकम का आंकड़ा 50 करोड़ से अधिक का रहेगा।

आढ़ती अमीर हो गए, जबकि बागवान कंगाल

महासचिव, किसान संघर्ष समिति एवं पूर्व मेयर शिमला संजय चौहान का कहना है पूरा घोटाला ढाई सौ करोड़ रुपये से अधिक का है। एपीएमसी अपने ही एक्ट को लागू नहीं कर रही है। पहले कुछ दिन में पेमेंट मिलती थी, अब साल बाद भी नहीं मिल पाती है। आढ़ती बागवानों के पैसों से अमीर हो गए, जबकि उत्पादक कंगाल बन गए। सीआइडी की एसआइटी ने बेहतर कार्य किया है। सबसे पहले इस मसले को दैनिक जागरण ने उठाया, इसलिए संस्थान के भी बागवान आभारी हैं। अगर मामला न उठाया होता तो एसआइटी का गठन ही नहीं हुआ होता। एक तो दाम कम मिल रहे हैं, दूसरे तय दाम समय पर नहीं मिल रहे हैं।

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