Himachal News: हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में मासिक धर्म को अशुद्ध मानकर महिलाओं पर पाबंदियां लगाई जाती हैं। कुछ दूरदराज इलाकों में महिलाएं माहवारी के दौरान गौशाला या अलग झोपड़ी में रहती हैं। यह प्रथा कुल्लू, कांगड़ा, चंबा, किन्नौर और शिमला जैसे जिलों में देखी जाती है। सरकारी प्रयासों से कुछ जिलों में यह कम हुई है, लेकिन 2026 में भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
कुल्लू जिला
कुल्लू जिले में यह प्रथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। जिला प्रशासन के सर्वे से पता चला कि 204 पंचायतों में से 91 में महिलाएं मासिक धर्म के समय गौशाला या अलग जगह पर रहती हैं। यहां महिलाओं को घर से बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि उन्हें अशुद्ध माना जाता है। ठंड और खतरे के कारण महिलाओं की सेहत बिगड़ती है। 2018 में शुरू हुए नारी सम्मान अभियान से जागरूकता फैलाई गई, जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, स्वास्थ्य कर्मी और स्थानीय समूह शामिल हैं। हेल्पलाइन भी चलाई गई, लेकिन दूर के गांवों में बदलाव धीमा है।
कांगड़ा जिला
कांगड़ा के दूरदराज इलाकों में महिलाएं माहवारी के दौरान गौशाला में रहती हैं। यहां उन्हें रसोई में जाने या मंदिर छूने की मनाही है। एनजीओ जैसे चिन्मय ऑर्गेनाइजेशन फॉर रूरल डेवलपमेंट ने मासिक धर्म स्वच्छता पर शिक्षा दी है। सरकारी योजनाओं से सस्ते सैनिटरी नैपकिन दिए जाते हैं, लेकिन देवी-देवताओं के डर से प्रथा जारी है। बैजनाथ और जोगिंदरनगर जैसे क्षेत्रों में यह देखा जाता है।
चंबा जिला
चंबा में मासिक धर्म को मिथकों से जोड़ा जाता है। महिलाओं को घर से अलग रखा जाता है और कभी-कभी गौशाला में भेजा जाता है। यहां महिलाएं पूजा या रसोई में नहीं जा सकतीं। स्थानीय देवताओं की मान्यताएं प्रथा को मजबूत बनाती हैं। जागरूकता अभियानों से कुछ सुधार आया है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह बनी हुई है।
किन्नौर जिला
किन्नौर के आंतरिक क्षेत्रों में महिलाएं माहवारी के समय अलग रहती हैं। उन्हें अशुद्ध मानकर गौशाला या अलग कमरे में रखा जाता है। यहां शिक्षा और सरकारी प्रयासों से प्रथा कम हुई है, लेकिन पूरी तरह नहीं। महिलाओं को दूध या दही जैसे उत्पाद छूने की मनाही है।
शिमला जिला
शिमला के ऊपरी इलाकों जैसे थियोग, चोपाल, रोहड़ू, कोटगढ़, कोठला और रामपुर में महिलाएं मासिक धर्म के दौरान रसोई या देवता के कमरे में नहीं जातीं। कुछ जगहों पर उन्हें गौशाला में रहना पड़ता है। यहां चार दिनों तक पाबंदियां लगती हैं। शिक्षित लड़कियां अब सवाल उठाती हैं, लेकिन परिवारिक दबाव से प्रथा जारी है। सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं नैपकिन वितरण से मदद करती हैं।
प्रथा के मुख्य कारण
हिमाचल में मासिक धर्म प्रथा धार्मिक विश्वासों से जुड़ी है। लोग मानते हैं कि मासिक रक्त अशुद्ध होता है। वैदिक काल से चली आ रही यह मान्यता देवताओं के क्रोध का डर पैदा करती है। महिलाओं को अछूत माना जाता है, जिससे वे घर से अलग हो जाती हैं। सांस्कृतिक मिथक जैसे इंद्र की कथा इस प्रथा को मजबूत बनाते हैं। स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा में अशुद्धता का भय मुख्य कारण है। अशिक्षा और परंपराएं इसे जारी रखती हैं।
निवारण के उपाय
सरकार नारी सम्मान अभियान चला रही है। इसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जागरूकता फैलाती हैं। 7 सैनिटरी नैपकिन वितरण और स्वास्थ्य शिक्षा दी जाती है। एनजीओ जैसे चिन्मय ऑर्गेनाइजेशन महिलाओं को शिक्षित करते हैं। कानूनी कदम जैसे नेपाल में प्रतिबंध उपयोगी हैं। 11 समुदाय स्तर पर अभियान चलाकर मिथकों को तोड़ा जा रहा है। स्कूलों में शिक्षा से नई पीढ़ी बदलाव ला रही है।
