Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में चल रही नर्सों की आउटसोर्स भर्ती पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने इस मामले में सख्त आदेश जारी किए हैं। कोर्ट ने सरकार को 5 जनवरी तक अपना पक्ष रखते हुए हलफनामा दायर करने को कहा है। अदालत ने सीधा सवाल पूछा है कि जब नियमों में पक्की भर्ती का प्रावधान है, तो आउटसोर्स का सहारा क्यों लिया जा रहा है।
750 पद खाली, फिर भी नहीं हो रही पक्की भर्ती
हाईकोर्ट ने आंकड़ों पर गौर करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। कोर्ट ने पाया कि 31 जुलाई 2024 तक स्टाफ नर्सों के करीब 750 पद खाली पड़े थे। इसके बावजूद राज्य सरकार ने केवल 28 पदों को नियमित आधार पर भरने की प्रक्रिया शुरू की। अदालत ने हैरानी जताई कि स्वीकृत पदों के विरुद्ध आउटसोर्स भर्तियां क्यों की जा रही हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह प्रथा सीधे तौर पर शोषण को बढ़ावा देती है। इससे योग्य युवाओं के भविष्य और लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
संविधान और मरीजों के अधिकारों का खुला उल्लंघन
अदालत ने आउटसोर्स कर्मियों के कम वेतन पर भी चिंता जताई है। कोर्ट ने माना कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम वेतन मिलता है। इसके अलावा, अदालत ने इसे मरीजों के जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के खिलाफ भी माना है। कोर्ट का कहना है कि आउटसोर्स कर्मचारियों पर विभाग का सीधा नियंत्रण नहीं होता है। ऐसे में यदि कोई लापरवाही होती है, तो उनके खिलाफ प्रभावी अनुशासनात्मक कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। यह मरीजों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
सरकार से मांगा इन सवालों का जवाब
हाईकोर्ट ने सरकार से पिछले एक साल का हिसाब मांगा है। अदालत ने पूछा है कि पिछले वर्ष स्टाफ नर्सों के कितने नियमित पद भरे गए हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या राज्य में आउटसोर्स कर्मचारियों को पक्का करने की कोई ठोस नीति है। क्या अब तक किसी कर्मचारी को नियमित किया गया है, इस पर भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। इसके साथ ही, अदालत ने वित्त विभाग के 13 अक्तूबर 2022 के उस पत्र की स्थिति पूछी है, जिसमें आउटसोर्स सेवाएं जारी रखने की बात कही गई थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की रोक हटाते हुए मामले को आठ सप्ताह में निपटाने का आदेश दिया था।
