Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वन माफिया और लकड़ी तस्करों पर कड़ा प्रहार किया है। अदालत ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अब लकड़ी की तस्करी और अवैध कटान के मामलों में पुलिस को वारंट का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पुलिस या वन अधिकारी अब आरोपी को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकते हैं। कोर्ट ने पुराने फैसले को पलटते हुए यह नई कानूनी व्याख्या दी है। इससे हिमाचल प्रदेश में वन संपदा की सुरक्षा और मजबूत होगी।
क्या है कोर्ट का नया आदेश?
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साल 2009 के ‘स्टेट बनाम सतपाल सिंह’ मामले के फैसले को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि भारतीय वन अधिनियम और हिमाचल प्रदेश वन उपज पारगमन नियमों के तहत आने वाले अपराध अब ‘संज्ञेय’ (Cognizable) माने जाएंगे। इसका मतलब है कि पुलिस सीधे कार्रवाई कर सकती है। पहले इन अपराधों को असंज्ञेय माना जाता था, जिससे अधिकारियों के हाथ बंधे रहते थे।
जमानत मिलेगी या नहीं?
अदालत ने यह भी साफ किया है कि भले ही पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन यह अपराध ‘जमानती’ (Bailable) ही रहेंगे। वन अधिनियम की धारा 65 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को बांड भरने पर रिहा किया जा सकता है। यह फैसला वनों की अवैध कटाई रोकने में मील का पत्थर साबित होगा।
नशा तस्करों पर सरकार को निर्देश
हाईकोर्ट ने नशा तस्करी के मामलों में भी हिमाचल प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश जारी किए हैं। पीआईटी एनडीपीएस एक्ट के तहत हिरासत में लिए गए लोगों के लिए स्थान और शर्तें तय करने को कहा गया है। अदालत ने सरकार को 15 जनवरी तक इस संबंध में आदेश जारी करने का समय दिया है। साथ ही, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिंदी भाषा में उसके अधिकारों की जानकारी लिखित में देनी होगी।
मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज
कोर्ट ने एक अन्य मामले में नशा तस्कर पवन कुमार की याचिका खारिज कर दी। आरोपी ने अवैध हिरासत का दावा करते हुए 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। उस पर कांगड़ा में चरस और चिट्टा तस्करी के 6 मामले दर्ज थे। गृह विभाग ने उसे तीन महीने हिरासत में रखने का आदेश दिया था। कोर्ट ने माना कि हिरासत आदेश में कोई गड़बड़ी नहीं थी।

