Manusmriti News: मनुस्मृति प्राचीन हिंदू ग्रंथ है जो महिलाओं को अधिकारों से दूर रखता है। यह महिलाओं को जीवनभर पुरुषों पर आश्रित बनाता है। पिता, पति और पुत्र उनकी देखभाल करते हैं। महिलाएं कभी आजाद नहीं हो सकतीं। कई श्लोक महिलाओं की प्रकृति को बुरा बताते हैं। वे धार्मिक कार्यों से रोकते हैं। अत्याचार के आदेश भी देते हैं। यह नियम महिलाओं की आजादी छीनते हैं। सदियों से यह ग्रंथ विवाद पैदा करता है।
मनुस्मृति हिंदू समाज के कानूनों का संग्रह है। यह दो हजार साल पुराना है। इसमें महिलाओं पर कई नियम हैं। ग्रंथ महिलाओं को कमजोर दिखाता है। पुरुषों को उनकी सुरक्षा का भार देता है।
महिलाओं की आजादी पर रोक
मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्र नहीं रहने देता। एक श्लोक कहता है: पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ यह महिलाओं को कमजोर बताता है। वे खुद की देखभाल नहीं कर सकतीं। उनकी बुद्धि पर नियंत्रण जरूरी है।
एक और श्लोक बताता है: बाल्या युवत्या वृद्धया वा स्वैरिणी न करोति यत्। गृहे रुध्येत तस्मात् स्त्री नित्यं रक्षा विधीयते॥ यह महिलाओं की स्वतंत्रता छीनता है। वे फैसले खुद नहीं ले सकतीं।
श्लोक जारी रखता है: पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्राश्च स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ यह जीवनभर निर्भरता लादता है।
धार्मिक अधिकारों से रोक
ग्रंथ महिलाओं को धार्मिक कार्यों से दूर रखता है। एक श्लोक कहता है: पतिना सह या नित्यं देवकार्ये व्यवस्थिता। सा तु स्वर्गे गमिष्यति पतिर्मृतोऽपि या पतिव्रता॥ यह महिलाओं को स्वतंत्र पूजा से रोकता है। वे धार्मिक कर्म अकेले नहीं कर सकतीं।
श्लोक बताता है: पतिमेव प्रिया नित्यं देववत् परिपूजयेत्। गुणवान् वा विगुणो वा पतिर्देवो न संशयः॥ यह महिलाओं को बंधन में बांधता है। वे पति के दोष नजरअंदाज करती हैं।
महिलाओं की प्रकृति पर आरोप
ग्रंथ महिलाओं की प्रकृति को नकारात्मक दिखाता है। श्लोक कहता है: शय्यासनमलंकारं कामक्रोधानृतानि च। अहिंसां प्रेष्यभोगं च स्त्रियो दुष्टा स्वभावतः॥ यह महिलाओं को दुष्ट बताता है।
श्लोक कहता है: दुष्टा स्त्रियः सदा रक्ष्या न रक्ष्याश्चापि पण्डिताः। असुरक्षिता द्वौ कुलौ नाशयन्ति स्वैरिणी॥ यह पुरुषों को रक्षक बनाता है। महिलाओं को खतरा मानता है।
दूसरे विवाह पर पाबंदी
मनुस्मृति दूसरा विवाह रोकता है। श्लोक कहता है: न द्वितीयं पतिं कुर्यात् सद्विचार्या नराधिप। द्वितीयं गच्छती या तु सा स्याद् व्यभिचारिणी॥ यह विधवाओं को बंधन में रखता है। वे नया जीवन नहीं शुरू कर सकतीं।
श्लोक बताता है: पुत्रार्थं स्त्री निषिद्धा स्यात् पतिलोकं न कामयेत्। पतिलोकं विहायैव इह लोके च हीयते॥ यह महिलाओं के प्रजनन अधिकार सीमित करता है।
महिलाओं पर अत्याचार के आदेश
ग्रंथ महिलाओं पर हिंसा की इजाजत देता है। श्लोक कहता है: पत्नी पुत्रो दासः शिष्यो भ्राता चैवापराधकृत्। रज्ज्वा वेणुदलेन वा ताडयेन्नोर्ध्वभागतः॥ यह पत्नी को अपराध पर रस्सी या बांस से मारने की अनुमति देता है। लेकिन ऊपरी भाग पर नहीं।
एक श्लोक कहता है: या पतिं द्वेष्टि नारी तां राजा श्वभिराशयेत्। बहुजनावृत्ते स्थाने॥ यह राजा को आदेश देता है कि पति से द्वेष करने वाली महिला को कुत्तों से खिला दे। सार्वजनिक जगह पर।
ये श्लोक प्राचीन समाज दिखाते हैं। आज विद्वान इनकी निंदा करते हैं। वे महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। मनुस्मृति को बदलना चाहिए। लेकिन यह हिंदू रिवाजों का आधार है। महिलाओं की हालत पर चर्चा चलती है।
