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पश्चिम बंगाल की विरासत: बांकुड़ा का ऐतिहासिक ‘मुड़ी मेला’, भगवान इंद्र से जुड़ी है इसकी उत्पत्ति

West Bengal News: बांकुड़ा का नाम आते ही एक खास स्ट्रीट फूड याद आता है। यह है मुड़ी, जिसे लोग मुरमुरे के नाम से भी जानते हैं। यह सस्ता होने के बावजूद सामाजिक समानता का प्रतीक माना जाता है। यह आम और खास दोनों तरह के लोगों को जोड़ने का काम करता है। इसकी लोकप्रियता पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में सबसे अधिक है।

मुड़ी कई रूपों में लोगों की पसंद बनी हुई है। कुछ लोग इसे मसालेदार झालमुड़ी के रूप में खाते हैं। कुछ इसे भेलपूरी की तरह पसंद करते हैं। इसका इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। यह इतिहास पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले से जुड़ा हुआ है।

हर साल लगता है विशेष मेला

बांकुड़ा जिले में हर साल एक खास मेले का आयोजन होता है। यह मुड़ी मेला केंजाकुड़ा इलाके में लगता है। यह द्वारकेश्वर नदी के किनारे आयोजित किया जाता है। यह मेला बंगाली महीने ‘माघ’ के चौथे दिन लगता है। इस दिन सुबह पांच बजे से ही भीड़ जुटने लगती है।

दूर-दराज से लोग अपने परिवार के साथ यहां आते हैं। वे पारंपरिक तरीके से एक साथ बैठकर मुड़ी खाते हैं। यह मेला सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का काम करता है। लोग इस दिन का साल भर इंतजार करते हैं। उनके लिए यह एक तीर्थ यात्रा के समान है।

नदी के पानी की है विशेष मान्यता

मेले में आने वाले लोग एक विशेष रस्म निभाते हैं। वे नदी की बालू खोदकर पानी निकालते हैं। यह पानी वे खुद पीते हैं और अपनों को भी पिलाते हैं। उनका मानना है कि यह पानी पवित्र और शुद्ध होता है। द्वारकेश्वर नदी उनके लिए तीर्थ स्थल के समान है।

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माता संजीवनी आश्रम इस नदी के तट पर स्थित है। यहां हर साल मकर संक्रांति के दिन संकीर्तन शुरू होता है। यह संकीर्तन माघ महीने के चौथे दिन समाप्त होता है। यह पूरा आयोजन धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।

प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा

प्राचीन समय से लोग दूर-दूर से यहां आते थे। वे संकीर्तन सुनने के लिए यहां रुकते थे। रात यहीं बिताने के बाद वे सुबह मुड़ी खाते थे। फिर वे अपने घर की ओर प्रस्थान करते थे। यह परंपरा आज भी कायम है।

मान्यता है कि इस मेले की शुरुआत भगवान इंद्र के समय हुई थी। कहा जाता है कि भगवान इंद्र अपने रथ से यहां से गुजर रहे थे। तभी उन्हें एक तेज आवाज सुनाई दी। उन्होंने इसका कारण जानने के लिए नारद मुनि को भेजा।

भगवान इंद्र से जुड़ी है कहानी

नारद मुनि ने जांच की तो पता चला कि स्थानीय लोग मुड़ी पर पानी डाल रहे थे। इससे एक जोरदार आवाज उत्पन्न हुई थी। यह आवाज इतनी तेज थी कि स्वर्ग तक सुनाई दी। इस घटना के बाद यहां मुड़ी मेले की शुरुआत हुई।

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तब से लेकर आज तक यह मेला लगातार आयोजित हो रहा है। अब यह मेला विश्व प्रसिद्ध हो चुका है। यह बांकुड़ा की पहचान बन गया है। यह स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है।

सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक

मुड़ी मेला सिर्फ एक खाद्य उत्सव नहीं है। यह सामाजिक एकजुटता को दर्शाता है। यहां हर वर्ग और हर उम्र के लोग एक साथ आते हैं। वे बिना किसी भेदभाव के साथ बैठते हैं। यह समानता और भाईचारे का संदेश देता है।

यह मेला पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करता है। लोग अपने रिश्तेदारों के साथ यहां आकर समय बिताते हैं। पुरानी यादें ताजा होती हैं और नए बंधन बनते हैं। यह सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम करता है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलता है बढ़ावा

इस मेले से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। छोटे व्यापारियों को अपना सामान बेचने का मौका मिलता है। परिवहन सेवाओं को भी फायदा होता है। स्थानीय होटल और ठहरने की जगहों पर व्यवसाय बढ़ता है।

यह मेला पर्यटन को बढ़ावा देने में भी सहायक है। दूसरे राज्यों के लोग भी इसे देखने आते हैं। इससे क्षेत्र की पहचान मजबूत होती है। सांस्कृतिक पर्यटन को प्रोत्साहन मिलता है। यह मेला बहुआयामी महत्व रखता है।

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