लाचार सपने -तृप्ता भाटिया

ठंड का प्रकोप हर कहीं जारी है, यह मौसम भी बेरहम होता है। जहां हम शिमला की बर्फ़बारी का आनंद लेते हैं, पेड़ो पर बंदरों को भी अठखेलियाँ करते देखते हैं और पर्यटकों को खुशी में झूमते। हर तरफ अपने-अपने मोबाइल लिए कोई सेल्फी ले रहा, कोई वीडियो बना रहा तो कोई लाइव। किसी को फिसलते देख हंस रहे तो कोई बोल रहा, इस मौसम में शिमला जैसी जगह में आइस क्रीम खाने का मज़ा ही कुछ ओर है।

इसी बीच मेरा ध्यान गया झुगियों वाले लोगों पर, काफी दिन हुए सड़क किनारे मुझे दिखीं नहीं। आते जाते उनके बच्चे अक्सर मेरी गाड़ी जाम में दो मिनट खड़ी हो जाती थी तो शीशा बजा कर उसे खोलने को कहते थे। कभी-कभी डेश बोर्ड पर एक दो सिक्के पड़े होते थे तो मैं उन्हें पकड़ा कर अपनी जान छुड़ा लेती थी। आज वो झुगियाँ नज़र नहीं आयी, ख्याल आया बिना कपड़ों के एक बच्चे ने पजामा पहना होता था तो कमीज़ नहीं होती थी, दूसरे पर कमीज़ होती थी तो पजामा नहीं होता था। मैंने दोनों को प्यार से एक बार बुलाया और पूछा कि मेरे साथ रहोगे, स्कूल भी भेजूंगी, इतना सुनते ही भाग खड़े हुये। अगली बार मुझे भी उनको पैसे दिए बिना भगाने का तरीका मिल गया बस इतना पूछा कि स्कूल जाओगे तो वो भाग गए।

आज इस बेदर्द मौसम की ठंड में ख्याल आया कि जो मौसम हम इंजॉय करते हैं न वो उनकी मौत के कारण होते हैं। बरसात की महलों वाले ख्वाईश करते हैं और झोपड़ी वाले सहमें हुए होते हैं। गर्मी में हम 10 बजे के बाद सुबह और शाम 5 बजे से पहले निकलना नहीं चाहते। हम एसी से बाहर नहीं आना चाहते और यह किसी पेड़ के नीचे सिसक रहे होते हैं। हम बड़ी आसानी से यह भी बोल देते हैं कि इनको आदत पड़ गयी होती है। लोग अपनी बिगड़ी आदतों के इंतजाम में लहू तक पी लेते हैं गरीब का। एक दिन इतनी बरसात होती है कि मै देखती हूँ एक चारपाई के ऊपर पांच-सात अपने बच्चों को बीच में लेकर कम्बल लपेटे हुए हैं, काली सी तरपाल से पानी टपक रहा है। चूल्हे में कुछ लकड़ियां सुलग रही हैं, आज आग सिर्फ पेट में ही लगेगी। मंज़र देख कर मेरे आंसू मेरे होंठो तक आ चुके थे, जाम खुल गया पर मेरे गले में घुटन सी हो रही थी। उस रात मैंने खाना तो बनाया पर खाया नहीं गया। निवाले मुझे रहम की नज़र से देख रहे थे और बोल रहे थे, अपनी किस्मत पर आज फक्र कर ले यह दो वक्त की रोटी जिसे तुम वासी, स्वाद न होने पर कचरे में फैंकते हो तो मैं भी झिल्ला उठता हूँ कि मुझे तुम सही ठिकाने में क्यों नहीं दे देते।

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