Himachal Pradesh News: कसौली की एक अदालत ने बुधवार को हरियाणा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली और गायक रॉकी मित्तल के खिलाफ चल रहे दुष्कर्म मामले में राहत दे दी है। अदालत ने पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई बंद कर दी है। यह फैसला सहायक जिला न्यायवादी विकास शर्मा की कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सुनाया गया।
मामला दिसंबर 2024 में सामने आया था जब दिल्ली की एक महिला ने कसौली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि जुलाई 2023 में वह एक सहेली और अपने बॉस अमित बिंदल के साथ कसौली घूमने आई थी। इस दौरान उसकी मुलाकात मोहन लाल बड़ौली और रॉकी मित्तल से हुई।
महिला ने पुलिस को बताया था कि आरोपियों ने उसे अपने कमरे में बुलाया। उन्होंने उसे नौकरी और मॉडल बनाने का लालच देकर दुष्कर्म किया। करीब डेढ़ साल बाद उसने यह शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद पुलिस ने महिला के साथ मिलकर संबंधित होटल में छानबीन भी की थी।
पुलिस ने जांच के बाद फरवरी 2025 में अदालत में एक कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की थी। इस रिपोर्ट में मामले को बंद करने की सिफारिश की गई थी। कसौली कोर्ट ने दो बार शिकायतकर्ता के पेश न होने पर इस रिपोर्ट पर विचार किया।
अदालत ने अंततः पुलिस की इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इस निर्णय के साथ ही मोहन लाल बड़ौली और रॉकी मित्तल के खिलाफ चल रहा मामला औपचारिक रूप से बंद हो गया है। इससे पहले शिकायतकर्ता ने सोलन के जिला एवं सत्र न्यायालय में इस कैंसिलेशन रिपोर्ट को चुनौती भी दी थी।
पुलिस सूत्रों के अनुसार जांच के दौरान आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके थे। होटल से प्राप्त सीसीटीवी फुटेज और अन्य गवाहों के बयानों में विसंगतियां पाई गईं थीं। इस आधार पर पुलिस ने मामला बंद करने का प्रस्ताव रखा था।
मामले में शामिल हरियाणा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने इस आरोप को हमेशा एक साजिश बताया था। दूसरी ओर गायक रॉकी मित्तल भी इस आरोप से इनकार करते रहे हैं। दोनों ने कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा जताया था।
कसौली कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया है। हालांकि शिकायतकर्ता अभी भी उच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दे सकती है। उसके वकीलों ने अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।
स्थानीय कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस रिपोर्ट और सबूतों के अभाव में अदालत के पास यही विकल्प बचता था। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत पुलिस ऐसी रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। अदालत इस रिपोर्ट पर विचार करने के बाद ही निर्णय लेती है।
इस मामले ने पिछले कुछ महीनों में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में काफी चर्चा बटोरी थी। एक वरिष्ठ राजनेता के नाम से जुड़े होने के कारण इसकी गूंज राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दी थी। अदालत के फैसले के बाद अब राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया देखने वाली होगी।

