मेरठ में बढ़ रहे जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर के मामले: किशोरों की पहचान का संकट बन रहा मेंटल स्ट्रेस का कारण

Meerut News: किशोरावस्था सपनों और उम्मीदों का दौर होता है, लेकिन जब यही उम्र अपनी पहचान को लेकर भ्रम और असमंजस में बदल जाए तो यह गंभीर मानसिक संघर्ष का रूप ले लेती है। मेरठ में अंशुल, मेघना और आर्यन जैसे कई युवा हैं जो जेंडर आइडेंटिटी डिस्फोरिया यानी जीआईडी से जूझ रहे हैं। नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (एनएमएचपी) की रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार सालों में ऐसे मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है।

तीन किशोर, तीन अलग कहानियां, एक ही संघर्ष

16 वर्षीय अंशुल कोलगता है कि वह लड़की है। उसे लड़कों जैसे कपड़े और व्यवहार का दबाव असहज करता था। स्कूल में मजाक का शिकार होने के बाद उसने परिवार को बताया। शुरू में माता-पिता ने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर काउंसलिंग कराई और उसकी पहचान को स्वीकार किया।

19 वर्षीय मेघना को बचपन से लड़कों वाली एक्टिविटीज और कपड़े पसंद थे, हालांकि वह जैविक रूप से लड़की थी। परिवार और समाज के डर से उसने अपनी पहचान छुपाई। लंबी काउंसलिंग के बाद उसने खुद को स्वीकार किया और धीरे-धीरे परिवार ने भी उसे अपनाया।

14 वर्षीय आर्यन की रुचियां लड़कियों वाली थीं। स्कूल में चिढ़ाए जाने के कारण वह गहरे तनाव में चला गया और आत्महत्या तक की नौबत आ गई। काउंसलिंग में पता चला कि वह जेंडर डिस्फोरिया से गुजर रहा है।

हर महीने आ रहे 8 से 10 मामले

एनएमएचपीकी रिपोर्ट बताती है कि बीते चार सालों में जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर के मामलों में तेजी आई है। विभाग के पास हर महीने करीब आठ से दस मामले पहुंच रहे हैं, जिनमें अधिकतर 13 से 24 वर्ष के युवा शामिल हैं। क्लीनिकल काउंसलर डॉ. विभा नागर बताती हैं कि युवा अपनी यौन रुचि को लेकर उलझन में रहते हैं। सही जानकारी के अभाव में उनमें गंभीर तनाव और डिप्रेशन देखने को मिल रहा है।

क्या है जेंडर डिस्फोरिया?

जेंडर आइडेंटिटीडिसऑर्डर या जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जैविक लिंग से असहज महसूस करता है और खुद को विपरीत लिंग का समझता है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे गर्भावस्था में हार्मोन गड़बड़ी, जेनेटिक बदलाव, बचपन के भ्रमित अनुभव, ट्रॉमा या सामाजिक अस्वीकृति जैसे कारण हो सकते हैं।

ऐसे दिखते हैं लक्षण

जीआईडीसे जूझ रहे युवा अक्सर अपने शारीरिक अंगों से असहज रहते हैं और उन्हें बदलने की इच्छा रखते हैं। उन्हें विपरीत लिंग के कपड़े पहनने और उनकी भूमिका निभाने में अच्छा महसूस होता है। उनमें समान लिंग के प्रति आकर्षण और उनसे जुड़ी गतिविधियों में रुचि देखी जाती है।

डॉ. विभा नागर का कहना है कि परिवारों को बच्चे के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। जेंडर डिस्फोरिया की समय पर पहचान और सही काउंसलिंग से किशोरों को मानसिक तनाव से बचाया जा सकता है और उन्हें सही मार्गदर्शन दिया जा सकता है।

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