New Delhi News: सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कार बताए गए हैं। इनमें अंतिम संस्कार यानी ‘दाह संस्कार’ सबसे अहम माना जाता है। गरुड़ पुराण (Garuda Purana) के अनुसार, विधि-विधान से अंतिम संस्कार होने पर ही मृतक की आत्मा को शांति मिलती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में हर किसी को मुखाग्नि नहीं दी जाती? शास्त्रों में 5 तरह के लोगों का दाह संस्कार करना सख्त मना है। इनके लिए अग्नि के बजाय जल या थल समाधि का नियम बनाया गया है। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक कारण।
गर्भवती महिलाओं का अंतिम संस्कार
गरुड़ पुराण (Garuda Purana) में स्पष्ट लिखा है कि गर्भवती महिला की मृत्यु होने पर उसका दाह संस्कार नहीं करना चाहिए। इसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह है। दरअसल, दाह संस्कार के दौरान शरीर के फटने की संभावना रहती है। ऐसे में गर्भ में पल रहे शिशु का शरीर बाहर आ सकता है, जो एक वीभत्स दृश्य हो सकता है। इसी संवेदनशीलता को देखते हुए गर्भवती महिलाओं को थल या जल समाधि देने का विधान है।
सांप के काटने से हुई मौत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की जान सांप के काटने या जहर की वजह से जाती है, तो उसे जलाया नहीं जाता। ऐसा माना जाता है कि जहर के प्रभाव से शरीर में सूक्ष्म प्राण लगभग 21 दिनों तक रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को पूरी तरह मृत नहीं माना जाता है। गरुड़ पुराण (Garuda Purana) के मुताबिक, ऐसे शव को जल समाधि देना ही सबसे उचित उपाय है।
छोटे बच्चों के लिए नियम
हिंदू धर्म में छोटे बच्चों का भी दाह संस्कार वर्जित है। अगर किसी बालक की मृत्यु 11 साल से कम उम्र में हो जाए, तो उसे अग्नि नहीं दी जाती। शास्त्रों का मत है कि कम उम्र में आत्मा का शरीर से मोह बहुत कम होता है। जिन बच्चों का जनेऊ संस्कार नहीं हुआ हो या बालिकाओं का मासिक धर्म शुरू न हुआ हो, उन्हें जल प्रवाह किया जाता है या दफनाया जाता है।
गंभीर बीमारी से मृत्यु
अगर किसी व्यक्ति की मौत किसी गंभीर संक्रामक बीमारी (Infectious Disease) से हुई है, तो उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता। इसके पीछे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। शव को जलाने पर बीमारी के वायरस या बैक्टीरिया धुएं के साथ हवा में फैल सकते हैं। इससे वहां मौजूद अन्य लोग बीमार पड़ सकते हैं। इसलिए सुरक्षा के लिहाज से ऐसे शवों को थल समाधि देना बेहतर माना गया है।
साधु-संतों की समाधि
आपने अक्सर देखा होगा कि साधु-संतों को जलाया नहीं जाता, बल्कि समाधि दी जाती है। गरुड़ पुराण (Garuda Purana) के अनुसार, सन्यास ले चुके लोगों का शरीर से मोह खत्म हो चुका होता है। उनकी इंद्रियां उनके वश में होती हैं। ऐसे दिव्य पुरुषों को अग्नि में समर्पित करने के बजाय सम्मानपूर्वक भू-समाधि या जल समाधि दी जाती है।
