हिमाचल प्रदेश सरकार ने गरीब परिवारों को बीपीएल से बाहर निकालने के लिए क्या गाइडलाइन की जारी हिमाचल प्रदेश सरकार ने गाइड लाइन में कहा गया है कि गाड़ी और पंखा घर में मिला तो बीपीएल से बाहर होंगे। गरीब परिवार लेकिन किसी गरीब परिवार को बाहर रोजी रोटी कमाने के लिए जाना पड़ता है तो वह अपने लिए सेकंड हैंड बाइक का इंतजाम करता है। अगर उसने सेकंड हैंड गाड़ी या कोई वाहन खरीदा होगा। इसका वह मालिक है तो उसमें उस गरीब परिवार की क्या गलती है एक तो करोना की वजह से लाखों गरीब परिवार को रोजगार नहीं मिल रहा है।

रोजगार पाने के लिए अगर उसको घर से 10 से 15 किलोमीटर बस से जाना पड़ता है तो उसके आने और जाने का किराया 150 रूपये खर्च हो जाते है। उसको मजदूरी 400 रूपये दिन मिलती है तो अगर उसने दो पहिया गाड़ी ली है वो भी 10 से 15 हजार रूपये की तो उसमें उस गरीब परिवार कि क्या गलती है। दिहाड़ी लगा कर वह अपना पेट और अपने परिवार का पेट पाल रहा है । अगर उसके घर पर पंखा या मोटरसाइकिल खरीद रखी है तो उसको भी बीपीएल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। यह गाइडलाइन हिमाचल सरकार के द्वारा जारी की गई है। जबकि सरकार को गाइडलाइन में बहुत सारी शर्ते रखनी चाहिए थी जिसमें जैसे कि बड़े-बड़े लोग है जो बीपीएल में है। जबकि लोगों के पास तो ऐसे मकान है जो शहर के मकानों से भी सुन्दर है और बहुत सारी जमीन है बहुत सारे जेवरात है। जिन लोगों के पास 3 बीघा से कम जमीन है उन्हीं को या हक प्रदान किया जाना चाहिए। वही लोग हैं जो इस कैटेगरी में आते है। बाकी तो हिमाचल प्रदेश में कहीं भी ऐसा कोई गरीब दिखाई नहीं देता है, जिसके पास अपना मकान ना हो।

पंखे का गरीबी से क्या रिश्ता है यह बेहद कठिन सवाल है। जबकि एक पंखे की कीमत मात्र 300 रुपये से शुरू हो जाती है। जिसको एक भिखारी भी बड़ी आसानी से खरीद सकता है। लेकिन हिमाचल की भगौलिक स्थिति की ध्यान में रखा जाए तो यह एक महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है। निचले हिमाचल में पंखे के बिना जीना मुश्किल ही नही बल्कि कई जगह नामुमकिन है। खास कर जब अब गर्मी आने वाली है तो बहुत ज्यादा तापमान होने पर पूरा हिमाचल मजबूरी में पंखा खरीदने पर मजबूर हो जाता है। जबकि ऊपरी हिमाचल में पंखे की जरूरत ना के बराबर पड़ती है। यहां प्रशासनिक अधिकारियों और सरकार का उद्देश्य साफ झलक रहा है। केवल ऊपरी हिमाचल के लोगों को ही बीपीएल में रखा जाएगा।

हिमाचल में दो दो घरों के मालिक बीपीएल में है, उनके खिलाफ सरकार शिकायत के बाबजूद कानूनी कार्यवाही नही करती। राइट फाउंडेशन ने शाला पंचायत के एक वार्ड सदस्य के खिलाफ एक साल पहले शिकायत दर्ज करवाई लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नही हुई। उधर एक और ताजा मामला बिलासपुर से सामने आया था जहां एक महिला के पास हिरे की अंगूठी है तक है। लोगों ने एसडीएम बिलासपुर, उपायुक्त बिलासपुर से लेकर मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश तक को शिकायत की। सबूत के तौर पर महिला के द्वारा 18 लाख की संपत्ति को लेने के कागज तक उपलब्ध करवाए, लेकिन मजाल है किसी ने उस महिला को बीपीएल से निकाल हो। या किसी तरह की कोई कानूनी कार्यवाही अमल में लाई हो।

हिमाचल प्रदेश सरकार में इतने बड़े-बड़े पढ़े-लिखे एचएस आईएस ऑफिसर जो इन गाइड लाइनों को बनाते है। उन लोगों को यह आदेश दिए जाए। हिमाचल प्रदेश के गांवों में जाकर इन बिंदुओं की जांच करें ताकि किसी गरीब का हक छीना ना जा सके। लेकिन हिमाचल सरकार ऐसा न करने के बजाए ऐसी ऐसी गाइडलाइनें जारी करती हैं कि इससे तो यह साफ पता चल जाता है कि हिमाचल सरकार में क्या हो रहा है। ऐसी गाइडलाइनओं को लेकर यह तो सरासर गरीब के साथ मजाक किया जा रहा है और गरीब के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही है और कुछ नहीं हो रहा है। इस गाइडलाइन से तो यह साफ जाहिर हो गया है कि सरकार चाहती है कि गरीब को ही साफ कर दिया जाए। ऐसी गाइडलाइनओं को जारी करने से कुछ नहीं हो सकता है हिमाचल प्रदेश में जबकि इन चीजों को धरातल पर जाकर देखना चाहिए सरकार को तब पता चल जाएगा कि हिमाचल प्रदेश में कितने लोग गरीब हैं और कितने लोग अमीर है जो गरीब परिवारों का हक छीन कर खा रहे हैं बीपीएल में होते हुए। तभी हिमाचल शिखर की ओर जाएगा अन्यथा यह स्लोगन देने का कोई फायदा नहीं है कि हिमाचल शिखर की ओर है।

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