सूचना के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकर बताया और केंद्र सरकार ने बाकायदा क़ानून बना कर सूचना के अधिकर के लिए कानून भी बनाया। केंद्र सरकार ने एक अच्छे कानून को लागू करके आम आदमी को सूचना प्राप्त करने का अधिकार दिया। क्योंकि लोकतंत्र में आम जनता पैसा देती है और चुने हुए लोग उन आम लोगों पर शासन करते है। इसलिए कहा गया था कि आम आम आदमी को जानने का पूरा अधिकार है कि कैसे उनके पैसे का प्रयोग करके सरकार में बैठे लोग प्रयोग करते है।

लेकिन आज तक यह हर जगह इस कानून का सही से प्रयोग नही होता। हिमाचल में सीधे फरमान सुना दिया जाता है कि सूचना नही मिलेगी। सीधे वेबसाइट देखे। जबकि सूचना का अधिकार अधिनियम में इस तरह का कोई प्रावधान नही है। कई मामलों में सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 का उल्लेख करके भी सूचना देने से मना कर दिया जाता है।

इसी तरह के एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग ने एक केस में फैसला दिया कि केवल सूचना अधिनियम की धारा 8 का उल्लेख करना ही सूचना ना देने का कारण नही हो सकता। सूचना क्यों नही दी जाएगी उसके बारे भी उल्लेख करना जरूरी होगा। केंद्रीय सूचना आयोग ने यह फैसला एक याचिकाकर्ता के केस की सुनवाई के दौरान दिया। दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही इस तरह का फैसला एक आवेदक के सीबीआई से सूचना मांगने के मामले में दे चुका है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि छूट के प्रावधान का जिक्र करना ही पर्याप्त नहीं है तथा लोक प्राधिकार को स्पष्ट करना होगा कि कैसे सूचना का खुलासा करने से यह धारा लागू होगी क्योंकि सूचना देना नियम है और इसे नहीं देना अपवाद है।

सूचना आयुक्त ने आरटीआई आवेदक एस हरीश कुमार की दलील से सहमति जताई कि स्थिति के बारे में बताने से और मामले के परिणाम से जांच प्रक्रिया पर असर नहीं पड़ेगा। सरना ने सीबीआई के सीपीआईओ को आरटीआई की धारा 8 (1एच) के संबंध में ‘ठोस स्पष्टीकरण’ के साथ संशोधित जवाब देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही सीबीआई को याचिकाकर्ता को मामले की स्थिति और परिणाम संबंधी सूचना भी मुहैया कराने को कहा गया ।

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