मध्यम वर्ग गरीबी रेखा की ओर तेज़ी से अग्रसर, जबकि निम्न वर्ग तो कब का धराशायी हो गया

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कोरोना महामारी के मद्देनजर देश के मध्यम वर्ग को डायन महंगाई ने तोड़ कर रख दिया है, नतीजतन वह तेजी से निम्न वर्ग की ओर अग्रसर है। वहीं निम्न वर्ग तेज़ी से गरीबी रेखा के नीचे की ओर भागते हुए जैसे चेतावनी दे रहा हो कि अगर महामारी और इस दौरान महंगाई पर जल्दी काबू नहीं पाया गया। तो हालात और अधिक बिगड़ सकते हैं। इसमें कोई दोमत नही है कि पिछले सालों में विभिन्न सरकारों ने अपनी-अपनी योजनाओं और नीतियों के माध्यम से कोरोड़ों लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने की कोशिशें की और उसका परिणाम यह हुआ कि वह निम्न वर्ग से मध्यम वर्ग में प्रवेश कर गया।

परन्तु इस महामारी के चलते वें लोग फिर गरीबी रेखा से नीचे आ गए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश में महामारी का असर सर्वाधिक निम्न और मध्य वर्ग पर पड़ा है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए अलग-अलग राज्य अपने यहां लॉकडाउन लगा और हटा रहे हैं। कई जगहों पर लोगों ने कोरोना महामारी के कहर को देखते हुए खुद ही लॉकडाउन लगा लिया है। उधर कई राज्य सरकारों ने भी लॉकडाउन की घोषणा करते हुए लोगों से अपने निजी कार्यालय, दुकानें, कारखाने और अन्य काम-धंधे बंद रखने का आग्रह किया है। इसके बावजूद अभी कोरोना महामारी के चलते जिस प्रकार से कोरोना संक्रमित आँकड़े दिन पर दिन देश में बढ़ते जा रहे हैं।

इन हालातों को देखकर ऐसा महसूस हो रहा है कि यह महामारी और लॉकडाउन इतनी जल्दी समाप्त नहीं होगा। वैसे भी जानकार पहले ही कह चुके हैं कि अगस्त में कोरोना की तीसरी लहर से देश में और अधिक मौतें होंगी। हाल ही में एक टीवी चैनल पर एरिक फीगल-डिंग ने दावा किया है कि भारत में मौतों का डाटा बहुत खराब है। सरकार मौतों की संख्या ठीक से नहीं बता रही है। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत में आगामी 1 अगस्त तक लाखों लोगों की मौत हो सकती है।

बता दें कि भारत में पिछले दिनों हर दिन का आंकड़ा करीब 27 हज़ार लोगों के सभी कारणों से मरने का आया था। इस प्रकार भारत में सभी कारणों से अगस्त तक करीब 24 लाख 30 हजार लोगों की मृत्यु होने की सम्भावना जताई गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इशारा कर दिया है कि कोरोना महामारी की तीसरी लहर और खतरनाक हो सकती है। इससे निपटने के लिए उन्होंने और कड़े फैसले लेने के भी संकेत दिए हैं तो इसका मतलब पूरे देश में एक बार फिर से लंबा लॉकडाउन लग सकता है?

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल कोरोना महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन के समय देशवासियों के मन जो जगह बनाकर एक विश्वास की आश जगाई थी। लेकिन इस बार उस आश की डोर कमजोर पड़ती और टूटती सी नज़र आयी। पिछले लाँकडाउन के चलते केंद्र सरकार ने जिस प्रकार सभी राज्यों के गरीबों, बेसहारा और किसानों के लिए राशन, कर्ज़-माफ़ी और बहुत से लोगों के बैंक खातों में रुपये भिजवाए थे।

वह इस साल दूसरी लहर के समय इस प्रकार की कोई योजना दूर-दूर तक दिखाई नहीं दी। जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार सोच में पड़े हुए हैं। उनका मोदी सरकार से सवाल है कि छोटे व्यापारी और मध्यम वर्गीय व्यापारी एवं मध्यम वर्गीय परिवारों की क्या गलती है? जिनको इस कोरोना महामारी में लॉकडाउन के दौरान सरकार से किसी भी तरह की सहायता और सहयोग नहीं मिल रहा? हमारी क्या गलती है कि हम पूरा दिन मेहनत करके अपने व्यवसाय और व्यापार से जो पैसा कमाते हैं, उससे घर का खर्चा, बच्चों की स्कूल और ट्यूशन फीस, घर, दुकान या अन्य जगहों का बिजली बिल, बैंक की किश्तें, दुकान और घर का किराया आदि देने में जान निकली जा रही है। रही सही कसर छोटे और मध्यम वर्गीय व्यापारियों की कमर इस ऑनलाइन बिजनेस ने तोड़ दी है।

पिछले साल लगे लॉकडाउन में गरीबों ने तो अपने बच्चों की पढ़ाई करीब करीब बंद ही कर दी है, लेकिन मध्यम वर्ग बिना आमदनी के भी बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर लगातार फ़ीस भर रहा है। इतना ही नहीं मध्यम वर्ग के लाखों लोगों की नौकरियां पहले ही चली गई हैं। ऊपर से तमाम खर्चों और इस डाउन महंगाई की मार मध्यम वर्ग के लोगों पर पड़ रही है। ऐसे हालात में मध्यम वर्ग अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित है। उसे डर है कि वह भी गरीबी रेखा से नीचे न चला जाए।

मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अगर वह चार पैसे कमाकर जैसे-तैसे जोड़ लेता है या कोरोना से पहले उसने कुछ पैसे बच्चों की ब्याह-शादी के लिए जोड़ रखे हैं, तो अब उन पैसों से घर चलाने के साथ-साथ वह उन्हें बीमारी में भी पानी की तरह बहा रहा है। दवाइयों, ऑक्सीजन की कालाबाजारी और डॉक्टरों की महंगी फीस ने उसका दिवाला निकालकर रख दिया है।

मध्यम वर्गीय व्यक्ति न तो मांगकर खा सकता और न ही इन दिनों उसे खाने-कमाने के लिए लॉकडाउन की परिस्थितियों में पुलिस प्रशासन बाहर जाने नही दे रहा है। ऐसे में उसकी दशा दो पाटों के बीच बेवजह पिसते घुन की सी हो गई है। मध्यम वर्गीय व्यक्ति की हालत पहले ही नोटबन्दी ने पतली कर दी थी अब इस बढ़ती महंगाई और बढ़ते टैक्स ने उसकी कमर ही तोड़ दी थी और अब कोरोना काल के इस लॉकडाउन ने बाकी हड्डियां तोड़कर रख दी हैं। यह मार गरीबों और मध्यम वर्गीय परिवारों को कहां ले जाकर पटकेगी, इसका अंदाजा अभी किसी को नहीं है।

मध्यम वर्ग अथवा असंगठित क्षेत्र का कर्मचारी इस समय बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जिसका कई तरह से शोषण हो रहा है। असंगठित क्षेत्र उसको आर्थिक रूप से लूट चुका है एवं सामान्य जीवनचर्या मे, मेडिकल स्टोर; जनरल स्टोर एवं रोजमर्रा के खर्चे आन्तरिक रूप से घायल कर रहे है। बाजार के सभ्य दुकानदार, जो दवाइयां, रोजमर्रा का सामान आदि बेच रहे हैं, मनमर्जी से लूट रहे हैं! या तो उनके मन के मुताबिक पैसे दो अथवा समान लेने के लिए भटकते रहो?

इतनी भयावह स्थिति हो गई है, इसको इस तरह से कहा जा सकता है कि कुछ लोग दिन में डाका डाल ले हैं वो भी आंखों के सामने और सरकारी तन्त्र कुछ नहीं कर पा रही है। एक असहाय जानवर की तरह! इसी तरह से यदि चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सड़कों पर खुले आम लूट मार, छीना झप्पटी की वारदात आम हो जाएगी? पढे लिखे लोगो को अनपढ़ लोग, ब्लैकमेल करेंगे।

इंसान का मानसिक स्तर बहुत नीचे गिर चुका, मनोबल टूट चुका और आपसी भाईचारा लगभग गायब होने के कगार पर है। आज इस विकराल परिस्थिति में जीवन निर्वाह करना अत्यंत कष्टकारी होता जा रहा है। ऐसे में सरकार को तत्काल इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। बिजली, पानी, रसोई गैस आदि के बिलों को संशोधित किया जाना चाहिए। जरूरत की रोजमर्रा की वस्तुएं या कम से कम मेडिकल सुविधाएं आम जनमानस को किफायती दाम पर अथवा मुफ्त मे मिले यह सुनिश्चित करना चाहिए। यदि इसी प्रकार सब चलता रहा तो वह दिन दूर नही, जब प्रशासन का भय एवं नियंत्रण समाप्त हो जाऐगा और खुले बाजार, हर जगह जनता को गुमराह कर लूटपाट करने लगेंगे?

कोरोना महामारी के पीछे लंबा सियासी और आर्थिक खेल चल रहाहै। इसकी एक सीधी सी मिसाल है कि लोगों को अस्पतालों में ठीक से इलाज नहीं मिलना। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम अपनी आंखों से हर रोज अपने परिवार के सगे सम्बंधियों, रिश्तेदारों और अन्य हजारों लोगों के मरने की खबरें सुन रहे हैं, पिछले दिनों दर्जनों लाशें हर रोज देख चुकें और हर दिन अपने किसी परिचित, प्रियजन के दुनिया से चले जाने की खबरें आ रही थी। दूसरी और मध्यम वर्ग पर आर्थिक दबाव बहुत अधिक बढ़ गया है जिससे कुछ लोगों के घर में राशन के भी लाले पडे हुए हैं।

केंद्र सरकार को चाहिए कि इसी तरह देशभर के अन्य राज्यों को भी प्रेरित करते हुए राज्यों की सरकारों का सहयोग करे। इस समय हमें स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक करने के अलावा कोरोना महामारी की तीसरी लहर से लोगों को बचाने के बारे में विचार करते हुए ठोस कदम उठाने चाहिए। सरकारों के साथ-साथ देश के धनाढ्य वर्ग को भी राष्ट्र की धन से मदद करनी चाहिए और जिन लोगों के पास धन का अभाव है उन्हें चाहिए कि वें अपना कुछ समय निकालकर अपने आस-पास के इलाके का ध्यान रखें कि कोई बीमार हो, तो कम से कम उसे तत्काल अस्पताल पहुंचा दें, या एंबुलेंस या दूसरा वाहन करके उन्हें अस्पताल पहुंचा दें।

बहरहाल हालांकि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश की कमोबेश हर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा में मध्यम वर्ग की बड़ी भागीदारी है। क्योंकि जैसे ही वह थोडा आर्थिक दृष्टि से मजबूत क्या हुआ। उसे समाज के अन्य कमजोर, गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से कोई वास्ता नहीं रखा, जिसका नतीजा यह हुआ कि सियासी दलों ने इन्हें जाति, धर्म, भाषा, प्रांत आदि के नफ़रत या बांटने के मुद्दों पर भटका कर सफलता हासिल कर ली।

व्यापारी और धनाढ्य वर्ग अपने धन की घटोतरी बढ़ोतरी में लगा रहा, उसका देश की राजनीति, नेताओं या चुनाव से कोई अधिक सरोकार नहीं रहता, उसका मुनाफा ही उसके लिए सर्वोपरि है। जबकि निम्न और मध्यम वर्ग के लिए जाति-पाती, बोली-भाषा, क्षेत्रवाद और धर्म-कर्म आदि के आधार पर अपने नेताओं को चुनता हैं। वह क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर नहीं बल्कि भावनाओं में बहकर इन सियासतदानों की बातों में फंस जाता है, न कि अपने घर की सुख सुविधाओं के बीच दुबके बैठे किसी खाए, अघाए मध्य वर्ग के व्यक्ति की तरह बाकायदा सोच समझ कर इन्हें आधार बनाता।

हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है कई मध्यम वर्गीय लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस संकट काल में गरीबों और जरूरतमंदों की की सेवा कर भी रहे हैं। मेरा तात्पर्य है कि जब तक हम सब आपस में मिलकर एक-दूसरे की मदद नहीं करेंगे, तब तक इस कठिन समस्या से निजात पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन हैं।

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