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चुनाव आयोग के वकील का इस्तीफा, कहा, मेरी नैतिकता के हिसाब से काम नही हो रहा

देश में कोरोनावायरस के केस बढ़ने के बावजूद पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने के फैसले के साथ आगे बढ़ने को लेकर चुनाव आयोग (ईसी) की लगातार आलोचना हो रही है। हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने टिप्पणी में कहा था कि चुनाव आयोग पर हत्या का केस चलना चाहिए। उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के खिलाफ आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी। हालांकि, शुक्रवार को ईसी को बड़ा झटका लगा। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय में आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने ईसी के वकीलों के पैनल से इस्तीफा दे दिया।

वकील ने इस्तीफा देते हुए कहा कि उनके मूल्य चुनाव आयोग के मौजूदा कामकाज के अनुरूप नहीं हैं। वकील मोहित डी राम 2013 से उच्चतम न्यायालय में आयोग के लिए अधिवक्ता के तौर पर काम कर रहे थे।

उन्होंने इस्तीफे के लिए भेजी गई चिट्ठी में कहा, ”मैंने पाया कि मेरे मूल्य निर्वाचन आयोग के मौजूदा कामकाज के अनुरूप नहीं हैं और इसलिए मैं उच्चतम न्यायालय के समक्ष इसके पैनल के अधिवक्ता की जिम्मेदारियों से अपने आप को मुक्त करता हूं।”

उन्होंने कहा, ”मैं अपने कार्यालयों में सभी लंबित मामलों में फाइलों, एनओसी और ‘वकालतनामाओं’ का सुचारू हस्तांतरण करता हूं।” बताया गया है कि वकील के इस्तीफे के पीछे चुनाव आयोग का मद्रास हाईकोर्ट के हत्या वाले बयान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला है। यह वकील ईसी के सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दायर करने के फैसले खिलाफ थे। हालांकि, चुनाव आयोग के एक प्रवक्ता ने कहा है कि जिस वकील ने इस्तीफा दिया है, उन्होंने 2019 से ही चुनाव पैनल का कोई केस नहीं संभाला है।

दूसरी तरफ चुनाव आयोग के आयुक्त राजीव कुमार ने एक मसौदा हलफनामे में कहा था कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के कुछ चरणों को कोरोना वायरस महामारी के चलते स्थगित करने से शेष चरणों के चुनाव राष्ट्रपति शासन के तहत कराने की नौबत आ सकती थी और ऐसा होने पर आयोग पर एक दल के खिलाफ दूसरे दल का पक्ष लेने के आरोप लगते। बताया गया है कि कुमार ने इस हलफनामे को मद्रास उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में पेश करने की योजना बनाई थी।

प्रक्रियात्मक कारणों के चलते दाखिल नहीं किए जा सके इस मसौदा हलफनामे में कुमार ने इस्तीफा देने और सजा भुगतने के लिये तैयार रहने की पेशकश करते हुए कहा कि “लोकतंत्र की रक्षा के लिए संस्था पर उठायी गई शंकाओं से मुक्ति दिलाने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि उस पर बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर और अपमानजनक शब्दों में आरोप लगाने का चलन शुरू हो जाए।

यह मसौदा हलफनामा भारत निर्वाचन आयोग की ओर से मद्रास उच्च न्यायालय में पेश अर्जी और उच्च न्यायालय की इन टिप्पणियों पर रोक लगाने के लिये उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका का हिस्सा नहीं था। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने आयोग की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उच्च न्यायालय की मौखिक टिप्पणियां “आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड” का हिस्सा नहीं हैं, लिहाजा उन पर रोक लगाने का कोई सवाल पैदा नहीं होता। गौरतलब है कि चुनाव संपन्न नहीं होने और विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो जाने की सूरत में किसी राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।

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