World News: लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला में एक बड़े युग का अंत हो गया है। पिछले 12 सालों से सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का शासन खत्म हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सनसनीखेज दावा किया है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी सेना (US Army) ने मादुरो को गिरफ्तार कर लिया है। मादुरो अपने पूरे कार्यकाल में अमेरिका और पश्चिमी देशों के विरोधी रहे। अब अपनी सत्ता गंवाकर उन्हें इस दुश्मनी की भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कसा था शिकंजा
वेनेजुएला के राष्ट्रपति के लिए बुरे दिन काफी पहले शुरू हो गए थे। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने साल 2025 में ही उन्हें ‘विदेशी आतंकवादी’ घोषित कर दिया था। इससे पहले 2020 में अमेरिका ने मादुरो पर ‘नार्को-टेररिज्म’ का आरोप लगाया था और उन पर 50 मिलियन डॉलर का बड़ा इनाम भी रखा था। अब 2026 के पहले हफ्ते में ही डोनाल्ड ट्रंप की सेना ने कार्रवाई करते हुए मादुरो को पकड़ लिया है। इस तरह एक और तानाशाही गढ़ गिर गया है।
बस ड्राइवर से राष्ट्रपति तक का सफर
निकोलस मादुरो का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उन्होंने 1970 में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। वे काराकास मेट्रो में एक बस ड्राइवर थे और उन्होंने वहां यूनियन बनाई थी। बाद में वे क्यूबा गए और वहां वामपंथी राजनीति की ट्रेनिंग ली। वेनेजुएला के पूर्व नेता ह्यूगो शावेज के साथ जुड़ने के बाद उनकी किस्मत चमक गई। वे देश के विदेश मंत्री और उपराष्ट्रपति भी रहे। शावेज की मौत के बाद 2013 में उन्होंने राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली थी।
सत्य साईं बाबा के भक्त हैं मादुरो
मादुरो का भारत से एक अनोखा रिश्ता रहा है। वैसे तो उनका परिवार कैथोलिक ईसाई था, लेकिन मादुरो भारतीय धर्मगुरु सत्य साईं बाबा से बहुत प्रभावित थे। वे बाद में उनके अनुयायी भी बन गए। मादुरो ने दो शादियां की हैं। उनकी दूसरी पत्नी सिलिया फ्लोर्स भी राजनीति में काफी सक्रिय रही हैं। वे शावेज की वकील और देश की आवास मंत्री रह चुकी हैं।
देश को कंगाली की हालत में पहुंचाया
मादुरो ने चुनाव तो जीते, लेकिन उन पर हमेशा धांधली के आरोप लगे। साल 2018 और 2024 के चुनावों को पश्चिमी देशों ने कभी सही नहीं माना। मादुरो के राज में वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो गई। देश में महंगाई आसमान छूने लगी और खाने-पीने की चीजों के लाले पड़ गए। हालात इतने बिगड़ गए कि 70 लाख से ज्यादा लोगों को अपना देश छोड़कर भागना पड़ा। मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों ने भी उनकी छवि को काफी नुकसान पहुंचाया।

