Himachal News: राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला की छात्रा की रहस्यमयी मौत के मामले में जांच अब और भी गहन हो गई है। रैगिंग और कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरे इस केस की गुत्थी सुलझाने के लिए अब एम्स (AIIMS) बिलासपुर के विशेषज्ञ भी मैदान में आ गए हैं। इस सनसनीखेज हिमाचल न्यूज ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। फोरेंसिक विज्ञान विभाग और स्वास्थ्य विभाग का मेडिकल बोर्ड मिलकर अब इस घटना की सच्चाई का पता लगाएगा।
मोबाइल खोलेगा मौत का राज
फोरेंसिक एक्सपर्ट्स अब डिजिटल सबूतों को खंगालने में जुट गए हैं। पुलिस ने आरोपी छात्राओं और मृतक छात्रा के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में ले लिया है। विशेषज्ञ इन फोनों से ऑडियो, वीडियो और व्हाट्सएप चैट जैसे डाटा का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। यह डिजिटल डाटा ही बताएगा कि आखिर छात्रा के साथ क्या हुआ था। हिमाचल न्यूज के मुताबिक, पुलिस को इन चैट्स से अहम सुराग मिलने की उम्मीद है।
बीमारी थी या रैगिंग का असर?
मेडिकल बोर्ड ने छात्रा की पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स की पड़ताल शुरू कर दी है। डॉक्टर यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि छात्रा की मौत किसी पुरानी बीमारी के कारण हुई या फिर रैगिंग और उत्पीड़न के तनाव ने उसकी जान ले ली। छात्रा का इलाज आठ अलग-अलग अस्पतालों में चला था। बोर्ड यह देखेगा कि इलाज की पद्धति क्या थी और मौत का असली कारण क्या था। बोर्ड अगले सात दिनों में अपनी रिपोर्ट पुलिस को सौंप देगा।
पुलिस की सख्ती और पॉक्सो एंगल
इस हिमाचल न्यूज में पुलिस का एक्शन भी तेज हो गया है। शुक्रवार को डीएसपी निशा कुमारी और एसएचओ नारायण सिंह ने आरोपी छात्राओं से कड़ी पूछताछ की। पुलिस स्कूल और कॉलेज से छात्रा की उम्र का रिकॉर्ड भी मांग रही है। अगर रिकॉर्ड में छात्रा घटना के समय नाबालिग पाई जाती है, तो आरोपियों पर पॉक्सो एक्ट भी लग सकता है। हालांकि, अभी तक इसकी संभावना कम ही जताई जा रही है। पुलिस छात्रा की कॉलेज में उपस्थिति का रिकॉर्ड भी चेक कर रही है।
प्रोफेसर की मुश्किलें बढ़ीं
मामले में आरोपी सहायक प्रोफेसर की अंतरिम जमानत 12 जनवरी को खत्म हो रही है। अब देखना होगा कि प्रोफेसर अपनी जमानत बढ़ाने की अर्जी देते हैं या नहीं। हालांकि, प्रोफेसर ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। यूजीसी और राज्य सरकार की जांच कमेटियां भी अपनी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को सौंपेंगी। डीआईजी सौम्या सांबशिवम ने पुष्टि की है कि जांच में पारदर्शिता लाने के लिए ही एम्स बिलासपुर की टीम को शामिल किया गया है।

