इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कर्ता-धर्ता इस आसान खतरे को समझ लें और जिम्मेदार बनें

0
24

इस बात में कोई संदेह नहीं कि चाक्षुष माध्यम होने के कारण इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रभाव समाज के एक बड़े वर्ग तक पहुंच चुका है। दिलचस्प यह भी है कि समाज का बौद्धिक और संजीदा वर्ग इलेक्ट्रानिक माध्यम से दूरी बनाकर रखता है। लेकिन उस आम जनता का क्या करें, जो अब भी मीडिया साक्षरता से दूर है और वह वितंडावादी दृश्यों को ही समाज की हकीकत मान लेती है।

देखा जाए तो न्यायपालिका मुखर होकर किसी मुद्दे पर सार्वजनिक विचार व्यक्त करने से बचती है। आम तौर पर वह स्वयं को अपने निर्णयों के जरिए अभिव्यक्त करती रही है। यही उसकी परंपरा है। ऐसे में जब न्यायपालिका किसी मुद्दे पर खुलकर बोलने लगे तो समझना चाहिए कि वह उस मुद्दे को लेकर क्या सोच रही है? मीडिया को इस बहाने खुद अपने अंदर झांकने की कोशिश करनी चाहिए और जहां उसे अपनी कमियां नजर आए, उन्हें दुरुस्त करना चाहिए। लेकिन इस ओर इलेक्ट्रानिक मीडिया के दिग्गजों का ध्यान जाता अभी नहीं दिख रहा है।

अन्‍ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन : तकनीक की प्रधानता के चलते इलेक्ट्रानिक मीडिया भारी पूंजी का खेल है। आरंभिक दौर में इसने रिपोर्टिग पर ज्यादा ध्यान दिया। लेकिन बाद में रिपोर्टिंग पर होने वाले खर्च में कटौती करते हुए टीवी चैनलों ने बहसों की शुरूआत की। अन्‍ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान साल 2011 में इस चलन को गति मिली। चूंकि बहस में होने वाले खर्च की तुलना में रिपोर्टिग का खर्च कई गुना ज्यादा होता है, लिहाजा चैनलों का पसंदीदा शगल बहस कराना हो गया। इसमें चैनल के एंकर की भूमिका ऐसे रिंग मास्टर में तब्दील होती गई, जिसका काम स्टूडियो या स्क्रीन पर उपस्थित दो-चार राजनीतिक बिल्लियों को लड़ाना हो गया। राजनीतिक विषयों की चैनली बहसों और उसके संचालनकर्ताओं की कामयाबी उसमें होने वाली चिल्लाहट की लंबाई और हंगामे की बुनियाद पर तय होने लगी। टीवी रेटिंग प्वाइंट के बहाने टीवी के स्क्रीन को गड़बड़ और भ्रष्ट बनाते वक्त अपनी सारी संपादकीय नैतिकता वे भूलते गए। इस चलन ने मीडिया ट्रायल की परिपाटी आरंभ कर दी। समाज का प्रबुद्ध वर्ग इस पर सवाल पहले से ही उठा रहा था, अब न्यायपालिका भी उठा रही है।

न्यायपालिका की नजर : बीते दिनों रांची में देश के प्रधान न्यायाधीश का यह कहना कि टीवी पर होने वाली बहसें पक्षपाती, दुर्भावना से भरी और एजेंडा चलित हैं, मामूली बात नहीं है। प्रधान न्यायाधीश इन बहसों के प्रभावों पर भी टिप्पणी कर रहे हैं। उनका कहना है कि मीडिया पर पक्षपात से भरी बहसें लोगों, व्यवस्था और जनतंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं। जिससे न्याय व्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ता है। समाज का संजीदा वर्ग तो पहले से ही मान रहा था कि चैनलों की बहसों में गहराई नहीं होती, संचालकों को विषयों की गहन जानकारी कम ही होती है। इसलिए इन बहसों का नतीजा दुर्भावना बढ़ाने के तौर पर ही दिखता रहा है। न्यायमूर्ति रमणा भी इसे स्वीकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि मीडिया में गलत जानकारी और एजेंडा आधारित बहसें ‘जनतंत्र को दो कदम पीछे’ ले जा रही हैं। प्रिंट माध्यम यानी समाचार पत्र इलेक्ट्रानिक की तुलना में अब भी कहीं ज्यादा संजीदा और जवाबदेह है। समाज के अच्छे-बुरे को वह समझता है। इसलिए चाहे समाचार हो या विचार, वह संतुलित रुख अख्तियार करने का प्रयास करता है।

इलेक्ट्रानिक माध्यमों की तुलना में संजीदगी : चूंकि प्रिंट माध्यम का जन्म गुलाम भारत में हुआ और उसका विकास स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ है। इस वजह से स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हमारे लोकवृत्त ने जिन जीवन मूल्यों को आत्मसात किया, उससे प्रिंट का माध्यम अछूता नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से उपजे प्रिंट यानी छापे के माध्यम में इसी वजह से इलेक्ट्रानिक माध्यमों की तुलना में संजीदगी कहीं अधिक नजर आती है। छापे के माध्यम में अतिवादी दृष्टिकोण अपवाद के तौर पर दिख सकता है। छापे के माध्यम ने घोषित-अघोषित तरीके से अपने दिशा-निर्देश तय कर रखे हैं। ये दिशा-निर्देश उसके कर्ताधर्ताओं के जीन में इस कदर रच-बस गया है कि उनका अवचेतन लगातार सक्रिय रहता है। इसे प्रधान न्यायाधीश भी रेखांकित करते हैं। रांची के अपने हालिया व्याख्यान में उन्होंने कहा भी है कि प्रिंट मीडिया में अभी भी काफी हद तक जवाबदेही शेष है। वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया में कोई जवाबदेही नहीं है और इंटरनेट मीडिया की स्थिति तो और भी बदतर है।

स्वनियमन और स्वनियंत्रण की अवधारणा : इलेक्ट्रानिक माध्यमों के चरित्र का विचलित विस्तार इंटरनेट मीडिया पर दिखता है। इंटरनेट मीडिया तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों की तुलना में कहीं ज्यादा बेलगाम और अशिष्ट हो गया है। फेक न्यूज, भ्रामक जानकारी के साथ ही तोड़े-मरोड़े तथ्यों को प्रस्तुत करने में उसका कोई सानी भी नहीं है। इंटरनेट मीडिया को इस वजह से नियंत्रित करने की मांग होती रही है। इंटरनेट मीडिया पर लगाम की किंचित कोशिशें हो भी रही हैं। लेकिन पारंपरिक मीडिया के विस्तार के तौर पर स्थापित इलेक्ट्रानिक माध्यम पर रोक लगाने की सीधी कोशिश से बचा जाता रहा है। स्वनियमन और स्वनियंत्रण की अवधारणा के तहत इलेक्ट्रानिक माध्यम खुद को संयमित और नियंत्रित करता रहा है। लेकिन देश के प्रधान न्यायाधीश ने जिस तरह टिप्पणियां की है, उससे साफ है कि अगर इलेक्ट्रानिक माध्यम ने अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझा, अपनी भूमिका को संयमित करने की कोशिश नहीं की तो देर-सवेर उस पर न्यायपालिका का चाबुक चल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो फिर कार्यपालिका को खुली राह मिल जाएगी। पहले से ही माध्यमों की मुश्क कसने की फिराक में बैठी कार्यपालिका भी अपना करतब दिखाने से नहीं चूकेगी। इसलिए जरूरी है कि इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कर्ता-धर्ता आसान खतरे को समझ लें और जिम्मेदार बनने की कोशिश करें।

Leave a Reply