मैं चीनी अधिकारियों से घिरा हुआ मरता हूं, यह मेरे लिए अफसोस की बात होगी; दलाई लामा

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धर्मशाला: तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने गुरुवार को कहा कि वह नापाक चीनी सेना की गिरफ्त के बजाय भारत के सच्चे और प्यार करने वाले लोगों, एक स्वतंत्र और खुले लोकतंत्र में अंतिम सांस लेना पसंद करेंगे. उन्होंने ये बात हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित अपने आवास पर संयुक्त राज्य शांति संस्थान (यूएसआईपी) द्वारा आयोजित दो दिवसीय संवाद में युवा नेताओं को संबोधित करते हुए कहा.

उन्होंने कहा, “मैंने पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि मैं 15-20 साल और जीवित रहूंगा, इसमें कोई शक ही नहीं है. जिस समय मैं मरूंगा, मैं भारत को चुनूंगा. भारत प्यार दिखाने वाले लोगों से घिरा हुआ है, यहां कुछ भी दिखावा नहीं है.” दलाई लामा ने कहा, “अगर मैं चीनी अधिकारियों से घिरा हुआ मरता हूं… यह मेरे लिए अफसोस की बात होगी. मैं इस देश के स्वतंत्र लोकतंत्र में मरना पसंद करूंगा हूं.” उन्होंने अपने फेसबुक पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में कहा था, “मृत्यु के समय… किसी को भी भरोसेमंद दोस्तों से घिरा होना चाहिए जो वास्तव में आपको वास्तविक भावनाएं दिखाते हैं.”

दलाई लामा को उनकी आध्यात्मिक शिक्षाओं और राजनीतिक विचारों के लिए जाना जाता है, लेकिन उन्हें आमतौर पर चीनी अधिकारियों द्वारा शक की निगाह से देखा जाता है. चीनी अधिकारी अक्सर उन्हें एक विवादास्पद और अलगाववादी व्यक्ति मानते हैं. 1950 के दशक में जब चीन ने तिब्बत पर अवैध रूप से कब्जा किया था, तब तिब्बती धर्मगुरु ने भारत में शरण ली थी. दरअसल दलाई लामा ने हमेशा से तिब्बत के मुद्दे पर चीन के साथ शांतिपूर्वक वार्ता की वकालत की है.

दलाई लामा पर भारत सरकार की स्थिति हमेशा से स्पष्ट और सुसंगत रही है. भारत उन्हें एक श्रद्धेय धार्मिक नेता मानता है और भारत के लोगों द्वारा उन्हें बेहद सम्मान दिया जाता है. भारत ने उन्हें देश में अपनी धार्मिक गतिविधियों करने की पूरी स्वतंत्रता दी है.

दलाई लामा एक ऐसी शख्सियत हैं जो न केवल अपने देश (तिब्बत) के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी लोकतंत्र और स्वतंत्रता की वकालत करते हैं. दलाई लामा ने चीनी आक्रमण के कारण 7 मिलियन से अधिक तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक नेता के रूप में अपनी भूमिका को त्याग दिया और पिछले कई दशकों से निर्वासन में रह रहे हैं.

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