धार्मिक स्वतन्त्रता कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 10 अक्टूबर तक टली

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून को चुनौती देने वाले मामले पर सुनवाई 10 अक्तूबर तक टल गई है। राज्य सरकार की ओर से जवाब दायर न करने पर मामले पर सुनवाई नहीं हुई।

हिमाचल धार्मिक स्वतंत्रता कानून अधिनियम 2019 के प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी गई है। आरोप लगाया गया है कि इस अधिनियम के प्रावधान भारतीय संविधान के विरोधाभासी हैं। ये प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पुष्टि की है कि अभी तक प्रदेश में इस अधिनियम में एक भी केस दर्ज नहीं हुआ है। ऐसी सूरत में कानूनी प्रावधानों को और सख्त बनाना कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में धर्मांतरण संशोधन विधेयक 2022 को मंजूरी दी जाती है तो उसकी संवैधानिक और कानूनी वैधता को चुनौती दी जाएगी।

प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के आखिरी दिन प्रदेश में धर्मांतरण संशोधन विधेयक को सदन में पारित कर दिया गया। इसमें अनुसूचित जाति और अन्य आरक्षित वर्ग के लोग अगर धर्म परिवर्तन करते हैं तो उनको किसी तरह का आरक्षण नहीं मिलेगा। इसके अलावा अगर वे धर्म परिवर्तन की बात छिपाकर आरक्षण की सुविधाएं लेते हैं तो ऐसे में उन्हें तीन से पांच साल तक सजा और 50 हजार से एक लाख रुपये तक का जुर्माना होगा। संशोधित कानून के मसौदे के मुताबिक किसी व्यक्ति की ओर से अन्य धर्म में विवाह करने और ऐसे विवाह के समय अपने मूल धर्म को छिपाने की स्थिति में भी तीन से 10 साल तक के कारावास का प्रावधान होगा। कानून में दो लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव है।

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