डॉ. यशवंत सिंह परमार जंयती: हिमाचल का वह मुख्यमंत्री, जो इस्तीफे देने के बाद बस में बैठकर घर चला गया

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शिमला. हिमाचल प्रदेश मंगलवार को प्रदेश निर्माता और अपने पहले सीएम डॉ. यशवंत सिंह परमार की जयंती मना रहा है. जब-जब भी हिमाचल निर्माण या इसके विकास की बात होगी, यशवंत परमार का नाम अग्रिम श्रेणी में लिया जाएगा.

4 अगस्त 1906 को डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म हुआ. उन्होंने एलएलबी और पीएचडी की पढ़ाई की थी. बताया जाता है कि जब उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दिया तो शिमला से एचआरटीसी की बस में सवार होकर अपने घर चले गए थे. हिमाचल प्रदेश में धारा-118 इन्हीं की देन है. इसके तहत बाहरी राज्यों के लोगों को यहां जमीन खरीदने की मनाही है।

यशवंत सिंह परमार की ईमानदारी का इससे बड़ा प्रमाण और नहीं होगा कि अंतिम समय मे भी उनके बैंक खाते में महज 563 रुपये 30 पैसे थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होने कोई मकान नहीं बनवाया, ना ही कोई वाहन खरीदा. जब वह मुख्यमंत्री नहीं थे तो बस में सफर करते थे.

वह पर्यावरण प्रेमी थे. एक भाषण मे उन्होंने कहा था ‘.. वन हमारी बहुत बड़ी संपदा है, सरमाया है. इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल में करनी है, नंगे पहाड़ों को हमें हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा. प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा लगाना होगा और पौधे ऐसे हों, जो पशुओ को चारा दे, उनसे बालन मिले और बड़े होकर इमारती लकड़ी के साथ आमदनी भी दे. वानिकी से पूरे प्रदेश मे संपन्नता आएगी.’

डॉ. परमार प्रदेश को कृषि-बागवानी में पहाड़ों को हरा-भरा बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने सोलन के नौणी मे विश्वविद्यालय भी स्थापित करवाया.

गौरतलब है कि सिरमौर रियासत में महाराज के वरिष्ठ सचिव शिवानंद सिंह भंडारी के घर चार अगस्त 1906 को यशवंत सिंह का जन्म हुआ था. स्थानीय स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद नाहन से दसवीं की और फिर बीए के लिए लाहौर चले गए. लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। यहां से उन्होंने डॉक्ट्रेट की और ‘द सोशल एंड इक्नॉमिक बैक ग्राउंड ऑफ द हिमालयन पॉलिएड्री’ विषय पर किताब लिखी.

शिक्षा पूर्ण करने के बाद डॉ. यशवंत सिंह परमार सिरमौर आ गए, जहां उन्हें रियासत का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. बाद में अपने एक फैसले के कारण उन्हें न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देना पड़ा और फिर कामकाज के लिए वह अपने भाई के साथ लाहौर चले गए, वहां दोनो भाइयो ने ठेकेदारी शुरू की.

बाद में जब देश और प्रदेश में स्वतंत्रता संग्राम जोर पकड़ चुका था. सन 1939 को शिमला के पास धामी गोलीकांड हुआ. इसी वर्ष लुधियाना मे अखिल भारतीय स्तर पर रियासतों का एक सम्मेलन हुआ, जिसमें प्रजामंडल की स्थापना की गई और शिमला हिल स्टेट्स प्रजा मंडल का भी गठन हुआ. परमार इसमे सक्रिय रूप से शामिल हो गए.

25 जनवरी, 1948 को शिमला के गंज बाजार मे प्रजा मंडल का सम्मेलन हुआ, जिसमें यशवंत सिंह की मुख्य भूमिका रही और यहां से प्रस्ताव पारित हुआ कि पहाड़ी क्षेत्रों मे रियासतें नहीं होनी चाहिए, इसे अलग प्रांत बनाया जाए. 28 जनवरी को सोलन में रियासती मंडल बनाने का प्रस्ताव पारित कर इसे ‘हिमाचल’ का नाम अनुमोदित किया गया.

डॉ. वाईएस परमार हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाना चाहते थे. सन 1952 में प्रदेश का पहला चुनाव हुआ, जिसमे हिमाचल निर्माता यहां के प्रथम मुख्यमंत्री बने. बाद में फिर से दो बार टैरीटोरियल काउंसिल के चुनाव हुए, लेकिन परमार ने इसमे भाग नहीं लिया.

नवंबर 1966 मे पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर हिमाचल का गठन हुआ. सन 1967 मे डॉ. यशवंत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने. 25 जनवरी, 1971 को उनकी मेहनत रंग लाई और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारी बर्फबारी के बीच स्वयं यहां आकर शिमला के रिज मैदान से हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करने की घोषणा की. दो मई 1981 को उनका निधन हो गया.

आज पूरा प्रदेश उन्हें श्रद्धंजलि और नमन कर रहा है. उनके जन्मदिन को राज्यस्तरीय कार्यक्रम के तौर पर मनाया जाता है. कांग्रेस के अध्यक्ष व सांसद प्रतिभा सिंह ने भी सोशल मीडिया के जरिये बधाई दी है.

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