उत्तराखंड का जोशीमठ विनाश के कगार पर, जानें आज तक उत्तराखंड में हुई मानवजनित तबाही के बारे

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उत्तराखंड अपने नैसर्गिक सौंदर्य, अध्यात्म, और धार्मिक महत्व के लिए अहम राज्य है. यह राज्य अपनी भौगोलिक संरचना के लिए भी बेहद संवेदनशील राज्य.पूरी दुनिया में कुदरत की सौंदर्यता के लिए जाना जाने वाला राज्य होने के साथ ही उत्तराखंड प्राकृतिक और मानवजनित आपदाओं के लिए भी जाना जाने लगा है, इसे इस राज्य का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं.

हाल ही में आदि गुरू शंंराचार्य के तपस्थली और चारों धाम में से एक बद्रीनाथ धाम के द्वार जोशीमठ के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. यहां हो रहे भू-धंसाव ने इस नगर को और यहां के रहवासियों की जिंदगियों को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां सिर्फ बेबसी और लाचारी मुंह बाहें खड़ी है. जोशीमठ शहर में भू-धंसाव से सैकड़ों घरों में दरारें पड़ने से लोग बेघर हो गए हैं. जोशीमठ बड़ी आपदा का दंश झेलने को तैयार बैठा है.

शहर बचान मुश्किल मगर लोगों की जिंदगियां बचाना जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि अब बहुत देर हो चुकी है. साथ ही वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अब लोगों की जिंदगी बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए. पहले ही काफी देर हो चुकी है. जोशीमठ में हो रहे भू धंसाव से अब उत्तराखंड की बड़ी आपदाओं का जिक्र छिड़ गया है कि क्यों सरकारों ने समय पर सबक नहीं लिया और विकास के नाम पर अधांधंंध निर्माण से इस पहाड़ी राज्य के पहाड़ों का छलनी कर दिया. परिणाम ये हुए कि आज एक शहर डूब रहा है. अब बात करते हैं उत्तराखंड की उन बड़ी त्रासदियों की जिनके जख्म जोशीमठ के बहाने हरे हो गए हैं मगर हुकुमतें आज भी बेखबर हैं.

केदारनाथ आपदा, हजारों लोगों की गई जानें

साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा उत्तराखंड के इतिहास की सबसे भयावह घटना है. जल प्रलय ने हजारों लोगों की जान ले ली. किसी को संभलने तक का मौका नहीं मिला. जो जहां था, वही दफन हो गया. कई महीने तक लोगों की खोज में अभियान चलाए गए. आज भी वहां दफन लोगों के नरकंकाल मिल रहे हैं. 16 से 17 जून, 2013 में लगातार अतिवृष्टि व बादल फटने के परिणामस्वरूप भूस्खलन व नदियों में तीव्र ऊफान के कारण रूद्रप्रयाग, चमोली, में उत्तरकाशी, पौढ़ी, टिहरी व पिथौरागढ़ जिलों में व्यापक जन-धन की हानि हुई. राज्य के ज्ञात इतिहास में यह सबसे बड़ी आपदा थी. इसमें हजारों लोग व मवेशी मलवे में दबकर व जल प्रवाह में बहकर काल के गाल में समा गए. सैकड़ों होटल व धर्मशालाएं व हजारों मोटर गाड़िया नष्ट हुई. इस आपदा में एक आंंकड़े के मुताबिक 3886 लोग या तो मारे गए अथवा लापता हुए. इसमें से मात्र 644 शव अथवा कंकाल मिले हैं. 3242 लोगों का कोई पता नहीं चल पाया. बाद में इन सभी लोगों को मृत मानकर उनके परिजनों को मुआवजा दिया गया. 18 जुलाई 2013 को राज्य सरकार द्वारा जारी आकड़ों के अनुसार इस आपदा में लगभग 13000 करोड़ के नुकसान का आंकलन किया गया.

खतरे के मुहाने पर उत्तराखं के कई जिले

वैज्ञानिकों ने भारत को 5 भूकम्पीय क्षेत्रों (जोन) में बांटा है, जिनमें दो क्षेत्र (जोन) उत्तराखण्ड में पड़ते हैं. देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर जिले संवेदनशील जोन-4 में आते हैं. जबकि चमोली, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत अति संवेदनशील जोन-5 में आते हैं. इनमें भी धारचूला, मुनस्यारी, कपकोट, भराड़ी, चमोली व उत्तरकाशी के भूभाग अत्यन्त संवेदनशील है.

उत्तरकाशी का भूकंप कई जिंदगियों को लील गया

20 अक्टूबर 1991 को उत्तरकाशी में 6.8 रिक्टर स्केल का भूकंप आया. जो कई जिंदगियों को लील गया. भूकंप उत्तराखंड ही नहीं पूरी दुनिया को कंपा दिया था. एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक, उस घटना में 768 लोगों की मौत हो गई थी और हजारों घर तबाह हो गए थे. कई लोग हमेशा के लिए बेघर हो गए. उस दिन को यादकर आज भी लोग दहशत में आ जाते हैं.

पिथौरागढ़, मालपा भूस्खलन, जमींदोज हुई 225 जिंंदगियां

18 अगस्त 1998 में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में बड़ी तबाही मची. जिले के मालपा गांव में चट्टान दरक गई. इस आपदा में 225 लोगों की मलबे में दबने से मौत हो गई. मृतकों में 55 लोग मानसरोवर यात्री थे. इस घटना के बाद मिट्टी और चट्टानों के मलबे ने शारदा नदी का जल प्रवाह रोक दिया था और इससे कई गावों में पानी घुस गया था. जिसके बाद बड़ा नुकसान हुआ. यह घटना भी उत्तराखंंड के लिए कभी न भूलने वाली आपदा है.

1999 में कांपा चमोली, भूंकप ने 100 लोगों दफन कर दिया

पिथौरागढ़, मालपा भूस्खलन के अगले ही साल 1999 में चमोली जिले में 6.8 रिक्टर स्केल का भयंकर भूकंप आया. इसमें 100 लोगों की मौत हो गई. चमोली जिले के अलावा भूकंप के असर से रुद्रप्रयाग जिले में भी बड़ी क्षति हुई थी. भूकंप के चलते नदियों का रूख बदल गया और नदी नालों से लगते कई गांवों में पानी घुस गया. भूकंप की भयावहता इतनी भीषण थी किसड़कों और इमारतों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं थीं.

1880 नैनीताल भूस्खलन, 151 लोग जिंदा दफन हो गए

18 सितंबर 1880 में नैनीताल के मल्लीताल क्षेत्र में भारी भूस्खलन हुआ. इस आपदा में 151 लोग जिंदा दफन हो गए थे. जिनमें 108 भारतीय और 43 ब्रिटिश नागरिक भी शामिल थे. भूस्खलन का मलबा आने से यहां प्रसिद्ध नैनादेवी मंदिर भी क्षतिग्रस्त हो गया था.

उत्तराखंड की ये आपदाएं राज्य को गहरे प्राकृतिक जख्म दे गईं.इस राज्य ने बहुत हद तक खुद को संभाला लेकिन इन त्रासदियों से सरकारों ने सबक नहीं लिया. वैज्ञानिक अध्ययन की कई चेतावनी भरी रिपोर्ट आज धूल फांक रही हैं. नतीजे आज जोशीमठ के तौर पर सबके सामने हैं और हुकुमतें बेपरवाह हैं और जिंदगियां एक और त्रासदी का इंतजार करने को मजबूर, लाचार हैं.

एक नजर में उत्तराखंड में हुई प्रमुख आपदाएं

23 जुन, 1980 उत्तरकाशी में भूस्खलन से तबाही.

1991- 1992 चमोली के पिंडर घाटी में भूस्खलन.

11 अगस्त, 1998 रुद्रप्रयाग के उखीमठ में भूस्खलन.

17 अगस्त, 1998 पिथौरागढ़ के मालपा में भूस्खलन में लगभग 350 लोगों की हुई मृत्यु.

10 अगस्त, 2002 टिहरी के बुढाकेदार में भूस्खलन.

2 अगस्त, 2004 टिहरी बांध में टनल धसने से 29 लोगों की हुई मौत.

7 अगस्त, 2009 पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में अतिवृष्टि.

17 अगस्त, 2010 बागेश्वर के कपकोट में स्कूल में हुए भूस्खलन से 18 बच्चों की हुई मौत.

16 जून, 2013 केदारनाथ में हुई जल प्रलय से हजारों लोगो की मौत.

16 जून, 2013 पिथौरागढ़ के धारचूला धौलीगंगा व काली नदी में आपदा.

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