हिमाचल में तीसरे दल को कभी नही मिली सत्ता, जाने क्या है इस बार के समीकरण

0
4

हिमाचल के मतदाता पिछले 42 सालों से कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी को ही अपना जनादेश दे रहे हैं. तीसरे दल को लेकर प्रदेश का मतदाता कभी गंभीर नहीं रहा. हालांकि, इसे लेकर कई बार प्रयास हुए.

1977 में जब भारतीय जनता पार्टी नहीं बनी थी, तो देश में चली जनता की लहर में प्रदेश में शांता कुमार के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, इनमें कई दल शामिल थे.ठाकुर कौल सिंह द्रंग से कांग्रेस फार डेमोक्रेसी जो बाबू जगजीवन राम की पार्टी थी, उनसे टिकट लेकर जीते थे. उसके बाद पिछले 42 सालों से लगातार सत्ता का बंटवारा भाजपा और कांग्रेस के बीच ही हो रहा है.

1990 में भाजपा ने जनता दल के साथ चुनाव पूर्व समझौता किया. प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया . कांग्रेस को केवल 9 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा 46 व जनता दल 11 सीटें ले गया. इसके बाद सबसे बड़ा प्रयास 1998 के चुनावों में हुआ जब मंडी के पंडित सुख राम ने हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई. हिमाचल विकास कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में चुनाव लड़ा, उन्हें टेलीफोन चुनाव चिह्न मिला था. पूरे प्रदेश में घंटी बजाने के बावजूद भी उन्हें पांच सीटें हासिल हुई. इन्हीं पांच सीटों के बल पर उन्होंने भाजपा के साथ समझौता किया और प्रेम कुमार धूमल की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनाई. यह किसी तरह से पांच साल चली और इसके साथ ही 2004 में पंडित सुख राम ने अपनी हिविकां जिसके वह 2003 में अकेले विधायक चुने गए थे को कांग्रेस में विलय कर दिया.

2003 में हिम लोकतांत्रिक मोर्चा भी सामने आया

2003 में हिम लोकतांत्रिक मोर्चा भी सामने आया. कई सीटों पर चुनाव लड़ा मगर जीत केवल धर्मपुर से महेंद्र सिंह ठाकुर को मिली. 2012 में यह कोशिश कुल्लू के महेश्वर सिंह ने भी की. प्रेम कुमार धूमल के साथ हुई अनबन के चलते भाजपा को सत्ता से बाहर करने के इरादे से अपनी ही पार्टी हिलोपा खड़ी कर दी. चुनाव तो पूरे प्रदेश में लड़ा पर जीत केवल कुल्लू सदर से अपनी ही सीट पाए. यह प्रयोग भी फेल हुआ. हालांकि, इसके अलावा भी समय समय पर कोशिश होती रही है.

जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष व पूर्व सांसद गंगा सिंह ठाकुर ने भी भाजपा से विद्रोह करके बीती सदी के नौवें दशक में हिमाचल देशम पार्टी बनाई मगर कोई भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया. और भी कई नेता अपना दल बनाकर प्रयास करते रहे मगर कामयाबी से कोसों दूर रहे. अब इस बार आम आदमी पार्टी बड़े जोर से मैदान में आई है मगर जो लय उसने अप्रैल महीने में पकड़ी थी वह समय समय पर घटित राजनीतिक घटनाओं से कमजोर होती गई.

आम आदमी पार्टी में बिखराव की स्थिति

आम आदमी पार्टी के अधिकांश वह नेता जो दूसरे दलों से आए थे, वापसी कर चुके हैं. जबकि संगठन के नाम पर इस पार्टी में पूरी तरह से बिखराव हो चुका है. ऐसे में इस बार भले यह दल प्रदेश में 67 सीटों पर चुनाव लड़ रहा हो मगर उम्मीदें बेहद कम दिखाई दे रही हैं. मंडी जिले के द्रंग से आप की उम्मीदवार सुनीता देवी ने नामांकन के बाद अपना नाम वापस लेकर यहां से पार्टी का खाता खाली कर दिया था. प्रदेश में एक दो सीट पर इसके उम्मीदवार कुछ करके दिखा भी दें तो सत्ता के बंटवारे में कोई बड़ा हाथ नहीं मार पाएंगे.

यूं प्रदेश में माकपा और भाकपा हर बार चुनाव मैदान में उतरती है. दोनों ही दल कुछ क्षेत्रों पर ही फोकस करते हैं. बिलासपुर नयना देवी, मंडी के बल्ह से तुलसी राम इसके विधायक भी रह चुके हैं. इसी तरह से माकपा के भी इक्का-दुक्का उम्मीदवार जीतते रहे हैं. वर्तमान में भी राकेश सिंघा ठियोग से वियायक हैं और फिर से मैदान में हैं. वह पहले भी विधायक रह चुके हैं. मंडी के जोगिंदनगर द्रंग से तारा चंद भी विधायक रह चुके हैं. इसी तरह से बसपा भी कांगड़ा से एक बार खाता खोल चुकी है मगर कोई भी दल अपने बल पर बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाया है.

ऐसे में हिमाचल का इतिहास इस बार का साक्षी है कि हिमाचल में सत्ता का बंटवारा भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होता है. सबसे बड़ा तो यह है कि हर पांच साल बाद जो प्रदेश में सरकार बदलने का रिवाज है वह इस बार बदलता है कि परंपरा कायम रहती है. भाजपा रिवाज बदल कर सरकार को रिपीट करने के नाम पर चुनाव लड़ी है जबकि कांग्रेस रिवाज कायम रखने के लिए सत्ता परिवर्तन के लिए चुनाव मैदान में उतरी थी. अब मतदाता ने बदला बदली की इस कसौटी पर रिवाज को रखा है या फिर ताज को, इसी का इंतजार है.

समाचार पर आपकी राय: