अध्यापकों के साथ सत्ता और सौगात की राजनीति -राजीव अम्बिया

कांग्रेस सरकार के सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री ने पीटिए शिक्षकों को नियमित करने का ऐलान कर दिया। पहली केबिनेट की बैठक में निर्णय करने को लेकर कमेटी भी गठित कर दी। जो पीटिए शिक्षकों के नियमितिकरण के सम्बंध में अपनी रिपोर्ट सरकार को देगी। धर्मशाला में चार दिनों के लिए पहुंची सरकार के पास सबसे पहले आने वालों में पैरा, पीटिए और पैट अध्यापक ही रहे। जब नौकरियाँ सौगात में मिली हो और हजूम बनाकर काम बनता हो तो भला पूरे प्रदेश से आकर इकठ्ठा होने में क्या हर्ज़ है।

2003-2007 के बीच पीटिए नियुक्तियाँ चर्चा में रही। तत्कालीन सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। 2007-2012 के बीच सत्ता मे रही धूमल सरकार ने ऐसी नियुक्तियों से दूर रहकर रोस्टर प्रणाली के आधार पर नियमित नियुक्तियों मे ही विश्वास रखा। जिससे प्रदेश के एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को संविधान के अनुसार नौकरियों मे हिस्सा मिला। प्रदेश मे जेबीटी बीए/ बीएससी/ बीएड/ एमए/ एमएससी कोर्स नियमित रूप से करवाए जा रहे है और ऐसे डिग्री धारक हजारों की संख्या में बेरोजगार हैं, जो बैच वाइज़ या परीक्षा के माध्यम से अपनी नियुक्तियों के इंतज़ार में हैं। लेकिन इन डिग्री धारकों को परे रखकर जब हवाई नियुक्तियों को तवज्जो दी जाती है, तो प्रदेश की जनता, बेरोजगार और शिक्षकविद्ध असमंजस मे पड़ जाते हैं। मात्र सत्ता के लिए सौगातें बंटन न्याय संगत नहीं हो सकता।

प्रदेश में उच्च न्यायालय भी अस्थाई नियुक्तियों के लिए सरकार को चेता चुका है कि ऐसी नियुक्तियों पर रोक लगा कर मात्र स्थायी नियुक्तियाँ ही की जाए । नियुक्तियाँ चाहे पीटीए, पैरा या पैट शिक्षकों की हो इसमे वरिष्ठता को नजरअंदाज किया जाता है। रोजगार कार्यालयों का कोई औचित्य नहीं रह जाता, जिसमें अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे पड़े-लिखे लोग कतार मे होते हैं। जिन्हे 45 वर्ष की आयु पार कर चुके अध्यापकों को नौकरी लग चुके होते। पीटीए जैसी नियुक्तियों में उन शिक्षकों को पढ़ाने वाला खुद बेरोजगार रह जाता है और उनका विध्यार्थी अध्यापक बन गया।

इससे कार्यरत्त अध्यापकों का प्रमोशन चैनल भी प्रभावित हुआ। जेबीटी से टीजीटी एवं टीजीटी से प्रवक्ता पद पर प्रोमोशन भी पीटिए शिक्षकों के कारण रुक गया। कई कार्यरत अध्यापक बिना पदौन्नति के ही सेवानिवृत हो गए। मौजुदा सरकार को चाहिए था कि 45 वर्ष कि आयु पार कर चुके व कर रहे बेरोजगार अभियर्थियों की बात करती, रोस्टर के आधार पर सभी प्रकार की नियुक्तियाँ करती, जो जेबीटी या पैट की वजह से नौकरी ना पा सके उनके लिए सबसे पहले सरकार निर्णय लेती। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत पात्रता टीईटी पास कर चुके उम्मीदवारों को रोजगार देने की बात करती प्रमोशन को लेकर सही नीति बनाती। टीईटी एवं वरिष्ठता और उनुबंध के आधार पर लगे शिक्षकों को नियमित करने की बात होती।

85वें संसोधन को लागू कर बैकलॉग के 916 टीजीटी पदों को भरने कि बात करती। लेकिन मात्र और मात्र पीटीए, पैट और पैरा से ही प्यार क्यों ? न्यायालय भी पीटीए शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी न होने कि बात कर चुका है। प्रदेश व्यवस्था पर पीसा जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम करने वाली संस्था ने विश्व रैंकिंग में 73 देशों में भारत 71वें स्थान का दर्जा दिलाने में हिमाचल प्रदेश की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा रहा है इसके पीछे शिक्षकों कि नियुक्तियाँ भी कारण रहा है।

1986, 1992, 1998, 2003से 2007 तक एडहॉक, स्वयंसेवी अध्यापक, अनुबंध, पैट, पैरा, विद्याउपासक, पीटीए आदि विभिन्न नामों से की गई नियुक्तियों से शिक्षा वयवस्था पर सवालिए निशान लगाए गए। अस्थाई नियुक्तियों के कारण शिक्षक असमंजस में की स्थिति में रहते हैं। स्थायीकरण के लिए आंदोलन करते रहते है, कम बेतन के कारण मानसिक दबाब में रहते हैं। जिससे शिक्षण कार्य प्रवाभित होते हैं। स्कूलों में स्थायी एवं अस्थाई शिक्षिकों मे तालमेल की कमी देखी जाती है। ऐसे में बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ होता है। शिक्षकों कि नियुक्तियाँ स्थायी एवं कड़े मानदण्डों के आधार पर होनी चाहिए, नाकि राजनीतिक आधार पर शिक्षकों की नियुक्तियाँ होनी चाहिए। एक शिक्षक का नाता दूसरे की जिंदगी सवारनें से होता है। शिक्षक के हाथ मे अंजान बचपन होता है, जिसे तराशना होता है फिर भी राजनेता शिक्षकों की नियुक्तियों को मज़ाक बना देते हैं।

जिस प्रदेश में शिक्षक असमंजस में हो, आन्दोलनरत्त रहते हों, मात्र राजनेताओं को फूलमालाएं पहना कर खुश करने में लगे रहते हों, वहां विद्यार्थियों के सुनहरे और उज्ज्वल भविष्य की कल्पना नहीं कि जा सकती। शिक्षा और शिक्षक ही देश की दशा औए दिशा सुधार सकते हैं। इसलिए शिक्षकों की नियुक्तियों को राजनीति से दूर रखकर विद्यार्थी हित, समाजहित, शिक्षा एवं शिक्षक हित और देशहित को मध्य नजर रख कर करना चाहिए, नाकि निजीहित को तवज्जो देनी चाहिए। निजीहित, देश व देशवासियों की प्रगति के लिए हानिकारक साबित होगा।

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