मोराजी देसाई ने मंडी के चांदनी चौक पर बैठ कर दिया था भाषण, लेकिन एक वकील के सवाल का जवाब नही दे पाए

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हिमाचल प्रदेश के मध्य भाग में स्थित मंडी हमेशा से राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम जिला रहा है. भले ही प्रदेश में कोई भी सरकार रही हो, ऐसा माना जाता है कि इसके बनने का रास्ता मंडी से ही होकर जाता है.

छोटी काशी के नाम से मशहूर इस शहर के साथ देश के बड़े-बड़े नेताओं की यादें जुड़ी हैं. मंडी शहर के बीचों-बीच ऐतिहासिक सेरी मंच इसका गवाह रहा है. इसी मंच से साल 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री मोराजी देसाई ने चुनावी जनसभा को संबोधित किया था.

मोरारजी देसाई सड़क मार्ग से जीप में मंडी पहुंचे थे, और यहां सेरी पैवेलियन की चांदनी से उन्होंने अपना संबोधन दिया था. मोराजी की उम्र उस समय लगभग 85 साल थी. शारीरिक दिक्कतों की वजह से वह खड़े होकर भाषण नहीं दे पा रहे थे. ऐसे में उन्होंने कुर्सी पर बैठ कर भाषण दिया था. उन्होंने लोगों से आह्वान किया था कि देश सेवा के लिए उम्र बाधक नहीं होनी चाहिए. युवाओं के जोश व बुजुर्गों के होश के साथ आगे बढ़ेंगे तो यह देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा. मोरारजी देसाई ने उस समय कांग्रेस को लेकर कहा था कि कांग्रेस देश के लिए खतरनाक है, इसे सत्ता में न आने दें.

जिला अदालत भी गए थे मोरारजी देसाई

मोरारजी देसाई उस समय बार एसोसिएशन के बुलावे पर जिला अदालत के बार रूम में भी गए थे. जहां पर एक वरिष्ठ वकील विश्वनाथ ने उन पर सवाल दाग दिया कि आपके प्रधानमंत्री होते हुए देश से सोना बिकता रहा, मगर आप कुछ नहीं कर पाए. इस पर वह कुछ सकपका गए और कोई जवाब उनसे देते नहीं बना.

मोरारजी देसाई को देखने उमड़ पड़ा था जनसैलाब

सिर पर सफेद नेहरू टोपी पहने मोरारजी देसाई को देखने-सुनने के लिए उस समय पूरा मंडी शहर उमड़ पड़ा था. उस उम्र में भी उनका जोश देखते ही बनता था. हालांकि, उनके आने से जनता पार्टी के उम्मीदवार को कोई ज्यादा लाभ नहीं हुआ और उसकी जमानत तक जब्त हो गई थी. 1982 में कांग्रेस के पंडित सुख राम मंडी से विजयी हुए थे, जबकि उनके साथ भाजपा के कन्हैया लाल ठाकुर का कड़ा मुकाबला हुआ था. महज 1200 के लगभग वोटों से पंडित सुख राम की जीत हुई थी मगर जिस जनता पार्टी के उम्मीदवार के लिए मोरार जी देसाई दिल्ली से यहां पहुंचे थे उसकी जमानत भी नहीं बच पाई थी.

बता दें कि 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और 1979 में उनकी सरकार गिर गई. हिमाचल प्रदेश में उस समय शांता कुमार की सरकार थी, जिसके खिलाफ अविश्वास मत आया और सरकार गिरा दी गई. राम लाल ठाकुर को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया, जबकि देश के प्रधानमंत्री की बागडोर चौधरी चरण सिंह के हाथ में चली गई.

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