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Wednesday, February 1, 2023
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आईए जानें क्यों दिया जाता है गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा पुरस्कार? क्या है रूह कंपाने वाला रंगा- बिल्ला का क्राइम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 11 बहादुर बच्चों से मुलाकात करेंगे. 5 से 18 साल के इन बच्चों को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कल पुरस्कृत किया था. भारत सरकार हर साल कई श्रेणियों में वीर और प्रतिभाशाली बच्चों को पुरस्कृत करती है. जिनमें बहादुर बच्चों के लिए गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा पुरस्कार भी शामिल है.

बहादुर बच्चों को आखिर क्यों दिया जाता है गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा पुरस्कार, इसकी एक खौफनाक दास्तां है. इसकी कहानी पढ़-सुनकर आज भी किसी की रुह कांप जाती है. देश के क्रूरतम हत्याकांड में से एक है गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा हत्याकांड. दोनों रिश्ते में भाई-बहन थे. दोनों के पिता नौसेना के अधिकारी मदन चोपड़ा थे. उनका अपना रुतबा था. वे दक्षिण दिल्ली के धौला कुआं में रहते थे.

बीच दिल्ली में किडनैप

गीता चोपड़ा जीसस एंड मेरी कॉलेज में कॉमर्स की पढ़ाई करती थी जबकि संजय चोपड़ा मॉडर्न स्कूल में 10वीं की पढ़ाई के साथ बॉक्सिंग में भी प्रैक्टिस करता था. बात 26 अगस्त 1978 की है जब गीता को एक सिंगिंग प्रोग्राम में हिस्सा लेना था. उसका प्रोग्राम रात 8 बजे रेडियो से लाइव ऑन एयर होना था. गीता के साथ उसका भाई भी साथ गया.

नई दिल्ली के गोल डाकखाना के पास दोनों भाई-बहन टैक्सी के इंतजार में खड़े थे. तभी रंगा और बिल्ला वहां आया और लिफ्ट देने के बहाने दोनों का किडनैप कर लिया. घरवालों ने रात 8 बजे जब उनका प्रोग्राम सुनने के लिए रेडियो चालू किया तो दोनों की आवाज नहीं सुनाई दी, क्योंकि दोनों आकाशवाणी नहीं पहुंच सके थे. उनका रास्ते में ही किडनैप हो चुका था.

हत्या और रेप को दिया अंजाम

रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह और बिल्ला का असली नाम जसबीर सिंह था. रंगा-बिल्ला की गाडी में बैठे दोनों बच्चों ने रास्ते में जोर की चीख लगाई. तभी रास्ते में जिन लोगों ने चीखते बच्चे की आवाजें सुनीं, उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी और गाड़ी का नंबर बता दिया. रंगा-बिल्ला ने रास्ते में सबसे पहले संजय चोपड़ा की निर्मम हत्या कर दी और उसके बाद फिर रिज़ एरिया में ले जाकर गीता के साथ बलात्कार किया और उसकी भी हत्या कर दी.

इधर परिवार में खलबली मच गई. सबसे पहले आकाशवाणी गये. फिर धौला कुआं थाने पहुंचे. हालांकि पुलिस के पास पहले ही दो बच्चों के अपहरण की सूचना पहुंच चुकी थी. लेकिन पहली बार में मदन चोपड़ा को यहां निराशा हाथ लगी तो उनके समर्थन में नौ सेना के कुछ और अधिकारी वहां पहुंचे. तब पुलिस हरकत में आई. 140 पुलिस वाले 30 अलग-अलग गाड़ियों से दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में तलाशी अभियान शुरू कर दिया.

बच नहीं सका रंगा-बिल्ला

हत्याकांड पर दिल्ली में बवाल बढ़ने के बाद रंगा-बिल्ला मुंबई भागे लेकिन कानून के शिकंजे से बचकर नहीं सके. दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद उनके खिलाफ लंबे समय तक केस चला. सेशन कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा लेकिन फांसी की सजा कम नहीं हो सकी. यहां तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने भी दोनों की दया याचिका खारिज कर दी.

आखिरकार हुई फांसी

31 जनवरी 1982 को रंगा-बिल्ला को फांसी दे दी गई. लेकिन इससे पहले ही 1978 में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने 16 साल के कम आयु के बहादुर बच्चों के लिए संजय चोपड़ा पुरस्कार और गीता चोपड़ा पुरस्कार देने का एलान किया. तभी से हर साल गणतंत्र दिवस से पहले ये वीरता पुरस्कार प्रदान किया जाता है.

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