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Saturday, February 4, 2023
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जानें भारत के उन वीर सपूतों के बारे, जिन्होंने पाकिस्तान और चीन को चटाई धूल, अब उनके नाम पर रखे द्वीपों के नाम

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अंडमान के 21 द्वीपों का नाम 21 परमवीर चक्र विजेताओं पर रखा. ये वो वीर सैनिक हैं, जिन्होंने कई बार पाकिस्तान को धूल चटाई, तो किसी ने चीन के छक्के छुड़ा दिए.

इनमें से तमाम ऐसे वीर सपूत भी हैं, जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया. पीएम मोदी ने कहा, यह देश के लिए दिए गए बलिदानों और भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम की अमरता का संदेश है. पीएम ने कहा, मेजर सोमनाथ शर्मा, पीरू सिंह, मेजर शैतान सिंह से लेकर कैप्टन मनोज पांडे, सूबेदार जोगिंदर सिंह और लांस नायक अल्बर्ट एक्का, वीर अब्दुल हमीद और मेजर रामास्वामी परमेश्वरन तक इन सभी 21 परमवीरों का एक ही संकल्प था – राष्ट्र प्रथम! इंडिया फर्स्ट! यह संकल्प अब नामकरण से हमेशा के लिए अमर हो गया है. आईए जानते हैं इन 21 परमवीर चक्र विजेताओं के वीरता की पूरी कहानी….

1- मेजर सोमनाथ शर्मा:

मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डेल्टा कंपनी के अधिकारी थे. 22 अक्टूबर 1947 को सूचना मिली की पाकिस्तान घुसपैठ करने वाला है. पाकिस्तानी घुसपैठ के समय उन्हें श्रीनगर एयरबेस की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था. उस समय मेजर शर्मा के दाहिने हाथ में प्लास्टर चढ़ा था. क्योंकि हॉकी खेलते समय उनका हाथ फ्रैक्चर हो गया था. मेजर शर्मा और 50 जवानों की उनकी कंपनी बडगाम में मोर्चा संभाला. मेजर शर्मा की टुकड़ी ने 700 लश्कर कबिलाइयों का सामना किया और मुंहतोड़ जवाब दिया. उन्हें 6 घंटे तक रोके रखा. मेजर शर्मा ने मुख्यालय को एक संदेश भेजा. उन्होंने कहा कि हम संख्या में बहुत कम है. दुश्मन हमसे सिर्फ 45-46 मीटर की दूरी पर है. हम भयानक गोलीबारी के बीच हैं. लेकिन हम अपनी जगह से एक इंच भी नहीं खिसकेंगे. हम आखिरी गोली और आखिरी जवान के रहने तक घुसपैठियों को जवाब देते रहेंगे. इसके थोड़ी देर बाद ही मेजर सोमनाथ शर्मा एक मोर्टार विस्फोट में शहीद हो गए. उनकी टुकड़ी के 20 जवान शहीद हुए, लेकिन उन्होंने पोस्ट पर कब्जा होने से बचा लिया. सोमनाथ शर्मा देश के पहले परम वीर चक्र विजेता बने.

2- लांस नायक करम सिंह:

13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान टिथवाल पर कब्जा करने के लिए रीछमार गली पर भयानक हमला शुरू कर दिया. इस दौरान लांस नायक करम सिंह 1 सिख फॉरवर्ड पोस्ट का नेतृत्व कर रहे थे. करम सिंह और उनकी टुकड़ी का हर सैनिक 10-10 पाकिस्तानियों से लड़ रहा था. लेकिन हिम्मत किसी की डोल नहीं रही थी. गोली बारी से लांस नायक करम सिंह जख्मी हो गए थे. लेकिन वो लगातार अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाए हुए थे. हथियार भी कम पड़ रहे थे. इसलिए बीच-बीच में दुश्मन पर ग्रैनेड फेंकते रहे. करम सिंह ने इस युद्ध के दौरान पाकिस्तान के कई हमले बेकार कर दिए. 21 जून 1950 में लांस नायक करम सिंह को परम वीर चक्र से नावाज गया. करम सिंह दूसरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने जिंदा रहते हुए परमवीर चक्र हासिल किया था.

आजादी के बाद पहली बार जब तिरंगा फहराने की बात आई तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पांच सैनिकों को चुना था. इसमें लांस नायक करम सिंह शामिल थे. उन्होंने सिख रेजिमेंट के पहली बटालियन में 15 सितंबर 1941 को ज्वाइन किया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा कैंपेन में बहादुरी दिखाने के लिए उन्हें मिलिट्री मेडल से सम्मानित किया गया था. करम सिंह का जन्म 15 सितंबर 1915 को पंजाब के बरनाला जिले के सेहना में हुआ था. पिता उत्तम सिंह किसान थे. पहले वो किसान बनना चाहते थे. लेकिन बाद पहले विश्व युद्ध से प्रेरित होकर सेना में भर्ती हो गए.

3- सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे

सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे- 10 जुलाई 1940 को 22 वर्षीय राम राघोबा राणे ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी ज्वाइन की. द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी वीरता देखने को मिली, जब उन्होंने बर्मा की सीमा पर जापानियों को पस्त कर दिया. लेकिन 1948 में पाकिस्तानी की तरफ से हुए कबिलाई हमले में वो वीर से परमवीर हो गए. वे देश के पहले भारतीय फौजी जिन्हें जीवित रहते हुए परमवीर चक्र से नवाजा गया. क्योंकि उन्होंने 3 दिन बिना खाए-पीए पाकिस्तानी फौजियों को पीछे धकेला. पीछे आ रही टैंकों और भारतीय जवानों के लिए रास्ता तैयार किया ताकि नौशेरा के आगे का हिस्सा घुसपैठियों के कब्जे से छुड़ाया जा सके.

4- नायक जदुनाथ सिंह:

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के खजूरी में 21 नवंबर 1916 में पैदा हुए थे जदुनाथ सिंह. 31 साल की उम्र में देश के नाम शहीद हो गए. उन्होंने नौशेरा के तैनधार पोस्ट को बचाने के लिए नायक जदुनाथ सिंह ने सर्वोच्च बलिदान दे दिया. दिसंबर 1947 में नौशेरा में पाकिस्तानियों को पीछे धकेलने की जिम्मेदारी नायक जदुनाथ सिंह को दी गई. पाकिस्तान के हमले में अपनी पोस्ट को बचाते समय उनकी टुकड़ी के चार जवान घायल हो गए थे. तब नायक जदुनाथ सिंह ने लाइट मशीन गन से दुश्मनों के सिर उड़ा दिए. सिंह की ताबड़तोड़ फायरिंग की वजह से दुश्मन समझ नहीं पाए और भागे. अगले हमले में स्टेन गन लेकर जदुनाथ सिंह ने पाकिस्तानी हमलावरों के पास जाकर उनकी धज्जियां उड़ा दी, लेकिन इस दौरान उन्हें दो गोली लगी. नायक जदुनाथ सिंह की बहादुरी की वजह से पोस्ट बच गई.

5- हवलदार मेजर पीरू सिंह:

पीरू सिंह शेखावत 6 राजपूताना राइफल्स में कंपनी हवलदार मेजर थे. जुलाई 1948 में पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में भयानक हमला किया. पाकिस्तानी फौजियों ने 8 जुलाई को रिंग कॉन्टोर पर कब्जा कर लिया. इसकी वजह से किशनगंगा नदी के पास मौजूद भारतीय फौज को पीछे हटना पड़ा. पोस्ट को फिर कब्जा करने पीरू सिंह शेखावत राजपूताना राइफल्स की छठी बटालियन के साथ उरी से तिथवाल रवाना हुए. 11 जुलाई को भारतीय फौज ने ऊंचाई पर बैठे पाकिस्तानी फौज के पोस्ट पर हमला शुरु किया. चार दिन तक दोनों तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग चलती रही. लेकिन पाकिस्तानी ऐसी जगह बैठे थे कि उनका कुछ भी बिगाड़ना मुश्किल हो रहा था. इस दौरान पीरू सिंह की टुकड़ी के ज्यादातर जवान शहीद हो गए थे या घायल हो गए थे. लेकिन पीरू सिंह अकेले आगे बढ़ गए और उन्होंने पाकिस्तानी पोस्ट पर मशीन गन से हमला कर दिया और पोस्ट पर कब्जा कर लिया. इसके बाद उन्होंने एक और पोस्ट को खाली कराया, लेकिन इस दौरान वे शहीद हो गए.

6- कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया:

संयुक्त राष्ट्र शान्ति सेना के पहले ऐसे सैनिक थे जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित (मरणोपरान्त) किया गया. शान्ति सैनिक के अधिकारी के तौर पर इस तरह का सम्मान अभी तक किसी और अधिकारी को नहीं मिला. कैप्टन सलारिया 5 दिसंबर 1961 को कांगो के दक्षिण अफ्रीका में हुए विद्रोह को दवाने के लिए यूएनओ की शांति सेना के साथ गोरखा राइफल की ओर से गए थे. वहां पर लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए.

7- मेजर धन सिंह थापा :

अगस्त 1949 में भारतीय सेना के आठवीं गोरखा राइफल्स में कमीशन अधिकारी के रूप में शामिल हुए थे. मेजर धनसिंह थापा परमवीर चक्र से सम्मानित नेपाली मूल के भारतीय नागरिक थे. थापा ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लद्दाख में चीन की सेना का सामना किया था. उन्होंने चीन युद्ध के दौरान दुश्मन सेना ने तीन साथियों समेत युद्ध बंदी बना लिया था. लेकिन वे चकमा देकर भाग आए. कई दिनों पहाड़ों में भटकते रहने के बाद थापा भारत में आ गए. उन्हें सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र देकर सम्मानित किया गया था.

8- सूबेदार जोगिंदर सिंह:

सूबेदार जोगिंदर सिंह के लिए जंग कोई बड़ी बात नहीं थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा की तरफ से लड़ाई लड़ी. 1947-48 में भारत-पाकिस्तान युद्ध लड़ा. कई पाकिस्तानी फौजियों को मौत के घाट उतारा. कइयों को वापस उनके मुल्क खदेड़ दिया. लेकिन उनकी असली बहादुरी की कहानी पता चली 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान. 20 अक्टूबर 1962 को चीन की सेना ने एक साथ कई इलाकों पर हमला शुरु कर दिया. चीनियों की सबसे बड़ी लालच तवांग पर कब्जा करना था. चीन को पता नहीं था की आगे की तरफ भारतीय सेना की पहली सिख बटालियन के जवान खड़े हैं. बुमला पास के पास सूबेदार जोगिंदर सिंह की टुकड़ी मौजूद थी, इसमें कुल 27 जवान थे. कुछ ही देर में इस फ्रंट पर लड़ाई शुरू हो गई. करीब 200 चीनी सैनिकों ने हमला किया. इस हमले में कई चीनी सैनिक मारे गए. कुछ घायल हो गए जितने चीनी सैनिक बचे वह भाग गए. 200 चीनी सैनिक दोबारा तैयार होकर हमला करने आए. इस हमले को भी भारतीय फौज ने नाकाम कर दिया. इसमें भारतीय सेना को भी नुकसान पहुंचा. इसी बीच सूबेदार जोगिंदर सिंह को भी गोली लगी. हालांकि, उन्होंने चीन के छक्के छुड़ा दिए.

तीसरा और आखिरी हमला भयावह था कुछ देर की शांति के बाद 200 सैनिकों की एक चीनी टुकड़ी फिर हमला करने आ गई. सूबेदार सिंह के घायल जवान इस टुकड़ी से टकरा गए. उस समय भारतीय जवानों के पास गोला बारूद लगभग खत्म हो चुका था. सूबेदार जोगिंदर सिंह भी घायल हो चुके थे. सूबेदार जोगिंदर सिंह ने बचे हुए सैनिकों को तैयार करके खंजर का उपयोग करने को कहा. राइफलों की नोक पर खंजर लगाए गए. बुरी तरह से घायल सूबेदार जोगिंदर सिंह को चीनियों ने युद्ध बंदी बना लिया. वहां से तीन भारतीय सैनिक बच निकले थे, जिन्होंने जा कर सूबेदार जोगिंदर सिंह की बहादुरी की कहानी लोगों को बताई. युद्धबंदी बनाए जाने के कुछ घंटों बाद हो गए शहीद पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने जब उन्हें बंदी बना लिया तो कुछ घंटे बाद ही वो शहीद हो गए. सर्वोच्च बलिदान देने, सैनिकों को युद्ध के दौरान प्रेरित करने और अंत तक लड़ने के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1962 में परम वीर चक्र से सम्मानित किया.

9- मेजर शैतान सिंह:

भारत-चीन 1962 युद्ध में करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर हाड़ कंपा देने वाली ठंड और बर्फीली हवाओं के बीच कुमाऊं रेजीमेंट की 13वीं बटालियन के 123 जांबाज जवान चीनी सैनिकों के लिए काल बन गए थे. बटालियन की अगुवाई मेजर शैतान सिंह भाटी कर रहे थे, जिन्होंने आखिरी सांस तक हार नहीं मानी और बचे हुए दुश्मन सैनिकों को उल्टे पैर भागने पर मजबूर कर दिया था. शैतान सिंह ने 123 भारतीय सैनिकों की अगुवाई करते हुए 1300 चीनी सैनिकों को न सिर्फ बुरी तरह रौंदा बल्कि बचे हुए सैनिकों को उल्टे पैर भागने पर भी मजबूर कर दिया था.

10- अब्दुल हमीद:

अब्दुल हमीद को 1965 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई में खेमकरन सेक्टर में पाकिस्तान के कई पैटन टैंक नष्ट करने के लिए परमवीर चक्र मिला था. अब्दुल हमीद उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक मामूली परिवार में जन्मे थे. अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान के सात पैटर्न टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे. इसी दौरान वह दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे. लेकिन उन्होंने शहीद होने से पहले दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे.

11- शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुरजोरजी तारापोरे:

शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुरजोरजी तारापोरे पुणे के रहने वाले थे. उनके वंशजों ने वीर शिवाजी महाराज की सेना का नेतृत्व किया था. तारापोरे को भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान मोर्चा संभालने के लिए युद्धक्षेत्र में भेजा गया. वो अपनी बटालियन के साथ लड़ते-लड़ते पाकिस्तान के सियालकोट पहुंच गए. यहां उन्होंने ऐसी रणनीतियां बनाकर हमला किया कि पाकिस्तान के सैनिक पीछे हटने को मजबूर होने लगे. इसके बाद तारापोरे को फिल्लौरा पर हमला करने को कहा गया ताकि चाविंडा को हथिया जा सके. तारापोर अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़े. पाकिस्तान दूसरी तरफ अमेरिका से मिले लेटेस्ट पैटन टैंक्स के साथ भारतीय सैनिकों पर गोले दाग रहा था. पर तारापोर और उनके सैनिकों ने भी जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस दौरान कई भारतीय जवान शहीद हो गए. लेकिन तारापोरे डटे रहे. उनकी टुकड़ी ने पाकिस्तान के 60 टैंक उड़ा दिए. इस दौरान तारापोरे जख्मी हो गए. वे शहीद हो गए. उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक, उनका अंतिम संस्कार युद्ध स्थल पर किया गया. उन्हें मरणोपरांत सेना के सर्वोच्च मेडल परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

12- अलबर्ट एक्का :

अलबर्ट एक्का का जन्म झारखंड के गुमला के जारी गांव में 27 दिसंबर 1942 को हुआ था. अलबर्ट एक्का 1962 में वे बिहार रेजिमेंट में शामिल हुए थे. उन्होंने 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लिया था. युद्ध के दौरान जख्मी होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन की सेना के छक्के छुड़ा दिए थे. एक्का ने हैंडग्रेनेड से पाकिस्तानी बंकर उड़ा दिया. इस लड़ाई में वे शहीद हो गए थे. मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

13- मेजर होशियार सिंह :

मेजर होशियार सिंह का 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बसंतर की लड़ाई का बड़ा योगदान है. बसंतर की लड़ाई में एक टुकड़ी का नेतृत्व मेजर होशियार सिंह कर रहे थे. पाकिस्तानी सेना 1971 में जब शकरगढ़ सेक्टर पर कब्जा कर बैठी थी, तब जर होशियार सिंह को उस वक्त पाकिस्तानी इलाके में स्थित जरपाल पर कब्जा करने का आदेश दिया गया. जब भारतीय सेना आगे बढ़ रही थी, इस दौरान उनकी टुकड़ी पर मशीनगन से हमला हुआ, लेकिन सीधी लड़ाई में होशियार सिंह ने पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद फिर फायरिंग शुरू हुई. पाकिस्तानी सेना टैंकों से गोले बरसा रही थी. इस दौरान कंपनी के कई सैनिक घायल हो गए थे. इसके बाद होशियार सिंह ने खुद मोर्चा संभाला और पाकिस्तानी सेना पर फायरिंग शुरू कर दी. पाकिस्तानी सेना अपने साथियों की लाशें छोड़कर भागने को मजबूर हो गई. 1971 के युद्ध के लिए चार जांबाज सैनिकों को परमवीर चक्र से पुरस्कृत किया गया. लेकिन उनमें अकेले मेजर होशियार सिंह ऐसे थे, जिनको यह पुरस्कार जीते जी मिला था. बाकियों को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.

14- सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल:

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए 16 दिसंबर, 1971 को वीरगति को प्राप्त हुए. उनके शौर्य तथा बलिदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे में हुआ था. वे एक फौजी परिवार से आते थे. अरुण ने बसंतर में मोर्चा संभाला था. इस दौरान उन्होंने दुश्मन के कई टैंक बर्बाद किए और इससे न सिर्फ पाकिस्तानी सेना का आगे बढ़ना रुक गया, बल्कि उनका मनोबल इतना गिर गया कि आगे बढ़ने से पहले दूसरी बटालियन की मदद मांगी. लड़ाई के दौरान वो बुरी तरह जख्मी थे, लेकिन इसके बावजूद टैंक छोड़ने को राजी नहीं हुए और दुश्मन के कई टैंक बर्बाद किए.

15- फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों:

भारतीय वायुसेना के फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अदम्य साहस और बहादुरी का परिचय दिया था, जिसके चलते पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी थी. हालांकि पाकिस्तानी वायुसेना के हवाई हमले से श्रीनगर एयर बेस को बचाने में निर्मलजीत सिंह सेखों शहीद हो गए थे. उनकी बहादुरी और अदम्य पराक्रम को देखते हुए साल 1972 में उनको मरणोपरांत सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मान किया गया था. साल 1971 में फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों पाकिस्तानी हवाई हमलों से घाटी की हवाई सुरक्षा करने के लिए श्रीनगर में तैनात नैट (Gnat) टुकड़ी के पायलट थे.

16- मेजर परमेश्वरन

13 सितंबर, 1946 को जन्मे परमेश्वरन वीरता की अद्भुत मिसाल कायम करते हुए 25 नवंबर, 1987 को श्रीलंका में शहीद हुए थे. वे शांति अभियान के तहत भारतीय सेना की टुकड़ी के साथ श्रीलंका गए थे. 25 नवंबर 1987 को उनका सामना तमिल टाइगर्स से हुआ था. दुश्मनों ने छिपकर फायरिंग करनी शुरू कर दी थी, जिसमें मेजर रामास्वामी को सीने में गोली लग गई थी, इसके बावजूद उन्होंने 6 उग्रवादियों को ढेर कर दिया था.

17- सूबेदार बन्ना सिंह

जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंट्री के नायब सूबेदार बन्ना सिंह को 1987 में पाकिस्तानी फौज द्वारा कब्जा की गई पोस्ट को खाली करने का टास्क मिला था. सूबेदार बन्ना सिंह के नेतृत्व में 21,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर में भारतीय सेना के जवानों ने पोस्ट खाली कराने का फैसला किया. उन्होंने काफी ऊंचाई पर बनी इस पोस्ट को ग्रेनेड्स से तबाह किया और कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. अति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विशिष्ट वीरता और उत्कृष्ट नेतृत्व का प्रदर्शन करने के लिए नायब सूबेदार बन्ना सिंह को परमवीर चक्र से नवाजा गया.

18- विक्रम बत्रा

करगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने दो महत्वपूर्ण चोटियों को पाकिस्तानियों के कब्जे से छुड़ाया था. प्यार से लोग ‘लव’ और ‘शेरशाह’ बुलाते थे. विक्रम ने अदम्य साहस और देश के लिए अभूतपूर्व निष्ठा दिखाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया. उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए. पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया. हम्प और राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया. इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया. बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया. विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया. अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया में आया तो हर कोई उनका दीवाना हो उठा. इसके बाद सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू कर दिया. इसकी भी बागडोर विक्रम को सौंपी गई. उन्होंने जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा. कारगिल के युद्ध के दौरान उनका कोड नाम ‘शेर शाह’ था. पॉइट 5140 चोटी पर हिम्मत की वजह से ये नाम मिला. कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा 7 जुलाई को शहीद हुए थे. इस नौजवान ने दिखा दिया था कि भारत के जवान किसी से कम नहीं.

19- कैप्टन मनोज पांडे:

कैप्टन मनोज पांडे करगिल युद्ध में 3 जुलाई 1999 को 24 साल की उम्र में शहीद हो गए थे. वे जंग पर जाने से पहले कहते थे कि ‘मेरा बलिदान सार्थक होने से पहले अगर मौत दस्तक देगी तो संकल्प लेता हूं कि मैं मौत को भी मार डालूंगा’. उन्होंने जंग पर जाने से पहले अपनी मां से वादा किया था कि वो अपने 25वें जन्मदिन पर घर जरूर आएंगे. वो घर तो आए लेकिन तिरंगे में लिपटकर. कैप्टन मनोज पांडे का जन्म 25 जून 1975 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रुधा गांव में हुआ था. करगिल युद्ध में भारत मां की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देकर मनोज इतिहास में अमर हो गए. मनोज पांडे को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.

20- सूबेदार मेजर संजय कुमार :

सूबेदार मेजर (तत्कालीन राइफलमैन) संजय कुमार के नाम पर अंडनाम के एक द्वीप का नाम रखा गया है. सूबेदार मेजर संजय कुमार ने कारगिल युद्ध में एरिया फ्लैट टॉप पर कब्जा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वे बिलासपुर जिले के रहने वाले थे. संजय कुमार ने कारगिल युद्ध में अपना पराक्रम दिखाया और दुश्मनों को उनके मंसूबों में कामयाब नहीं होने दिया. उन्हें भारत सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया था.

21- कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव

कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव को सबसे कम उम्र में देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. करगिल युद्ध में 19 साल के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को 18 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट की घातक प्लाटून के साथ-साथ टाइगर हिल पर कब्जा करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य दिया गया. कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव को युद्ध के दौरान 18 गोलियां लगी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दुश्मन सेना के छक्के छुड़ा दिए. वह एकमात्र जीवित परमवीर चक्र विजेता जवान हैं.

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