Bhagat Singh: जाने कैसे थे छोटी सी उम्र में अपने ही बलिदान की योजना बनाने वाले शहीद भगत सिंह

0
62

आज भारत के वीर सपूत भगत सिंह का जन्म दिवस है। उनके जन्मदिन से ठीक तीन दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में यह ऐलान किया कि चंडीगढ़ एयरपोर्ट का नामकरण भगत सिंह के नाम पर किया जाएगा। पीएम मोदी ने कहा कि भगत सिंह की जयंती से ठीक पहले उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। पंजाब के लोग लंबे समय से मांग कर रहे थे कि चंडीगढ़ एयरपोर्ट का नाम भगत सिंह एयरपोर्ट रखा जाए, जो अब साकार होने जा रहा है।

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा, चकनंबर 105 (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 23 मार्च 1931 को इन्हें लाहौर में फांसी दी गई। इस तरह देखा जाये तो भगत सिंह आज के 115 वर्ष पैदा हुए और 91 वर्ष पहले शहीद हो गए थे। अपने जीवन में भगत सिंह आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी धारा से जुड़े रहे। उनका जीवन कुल 23 साल का रहा। इतने कम समय में उन्होंने ऐसा क्या अलग किया कि आज भी उन्हें देश के हर दल, धर्म और क्षेत्र के लोग अपना आदर्श मानते हैं?

अपने ही बलिदान की योजना बनाने वाले भगत सिंह

सामान्यतः देखा जाता है कि लोग अपने जीवन की योजना बनाते हैं लेकिन भगत सिंह अपवाद थे। उन्होंने अपने बलिदान की योजना बनाई। स्वतंत्रता आंदोलन में देश में फांसी का फंदा चुनकर सैकड़ों लोग वीरगति को प्राप्त हुए हैं। भगत सिंह उनमें श्रेष्ठ इसलिए माने गए क्योंकि अपने बलिदान को उन्होंने खुद अपनाया। अपना बलिदान देकर वे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन गए। उनका छोटा सा जीवन हजारों जिंदगियों पर भारी पड़ा। फांसी पर झूलने के बाद देश में उन्होंने हजारों बलिदानी जत्थों का निर्माण करने में योगदान दिया और शहीद-ए-आजम कहलाए।

दरअसल, असेंबली बमकांड की सुनवाई के पहले भगत सिंह और उनके साथियों की पहचान क्रांतिकारी संगठनों तक ही सीमित थी। देश के अंदर वे सब पहचाने तो जाते थे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जन सामान्य के लिए वे उतनी रूचि के विषय नहीं थे। अदालती कार्रवाई के दौरान क्रांतिकारियों के विचार ने देश भर में खलबली मचा दी। रातोंरात क्रांतिकारियों को राष्ट्रीय पहचान मिली। अब वे एक पार्टी और संगठन के नहीं बल्कि देश भर की जनता की आंखों के तारें और देशभक्तों के दुलारे हो गए।

6 जून 1929 को जब क्रांतिकारियों की पैरवी करने वाले सुप्रसिद्ध वकील और कांग्रेस नेता आसफ अली ने खचाखच भरी अदालत में भगत सिंह का बयान पढ़ा, दूसरे दिन सारे अखबारों में हूबहू उनका बयान छपा तो देश में क्रांतिकारियों को नए सिरे से समझने का सिलसिला शुरू हुआ। कल तक जो जनता के बीच बम और हथियारों के पुजारी के रूप में जाने जाते थे, अब वे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता से युक्त समाज की स्थापना करने वाले परिपक्व राजनेता के रूप में सामने आए। अदालती कार्रवाई के दौरान क्रांतिकारियों की लोकप्रियता का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता गया। भगत सिंह का बलिदान उनके जीवन से बड़ा बन गया।

भगत सिंह के वीरगति प्राप्त करने के 91 वर्ष बाद भी उन पर हर भाषा में लिखा जा रहा है जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का ही परिणाम है। भगत सिंह पर कुछ वर्षो में विपुल साहित्य लिखा गया। भगत सिंह पर अब तक 50 से अधिक पुस्तकें हिंदी, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। असंख्य लेख और शोध पत्र छपे हैं। भगत सिंह को 23 मार्च 1931 में जब लाहौर में फांसी दी गई तो दूसरे दिन कई अखबारों ने विशेष अंक निकाले। किताबें और बुकलेट लिखी गईं। अपने जीवन के बलिदान के बाद भी भगत सिंह लोकप्रियता के शिखर पर रहे। प्रेस ने क्रांतिकारियों के साथ ही भगत सिंह को खूब कवरेज दिया। लेकिन देखा जाता है कि भगत सिंह को अलग-अलग रूपों में पेश किया जाता है। शासन से लेकर समाज तक अपने-अपने तरीके से भगत सिंह को अपनाने की परंपरा चल रही है। कांग्रेस से लेकर वाम और अकाली दल तक भगत सिंह को जनता के सामने अपने राजनीतिक विचारों के अनुसार प्रस्तुत करते हैं।

भगत सिंह का परिवार

भगत सिंह का जन्म पंजाब के एक जट्ट सिख किसान परिवार में हुआ। परिवार की आर्थिक स्थिति न तो बहुत बुरी थी और न बहुत अच्छी। भगत सिंह के दादा स्वर्ण सिंह, पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले थे। उनके चााचा अजीत सिंह गदर पार्टी के प्रसिद्ध क्रांतिकारी रहे हैं। परिवार पर आर्य समाज का प्रभाव था। भगत सिंह का कुल जीवन 23 साल का था। इतनी कम उम्र में भी आठ वर्ष बचपन का समय है। लगभग 15 साल का उनका जीवन कई पड़ावों से गुजरा।

बब्बर अकाली आंदोलन, आर्य समाज, जयचंद्र विद्यालंकार, शचीन्द्रनाथ सान्याल जैसे लोगों से वह जुड़े। घर से फरार होकर वह कानपुर और कई जगह रहे। उस समय यूरोप में लोकप्रिय हो रहे समाजवाद को जानने समझने में 1926 के बाद उनकी रुचि बढ़ी। देश की स्वतंत्रता के लिए गांधी जी ने जहां सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया, वहीं पर भगत सिंह और उनके साथियों ने सशस्त्र क्रांति के माध्यम से आजादी का मार्ग चुना।

भगत सिंह का पुश्तैनी गांव

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा, चकनंबर 105 (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 23 मार्च 1931 को इन्हें लाहौर में फांसी दी गई। यह अजीब संयोग है कि आजादी के बाद उनका जन्म स्थान और शहीद स्थल पाकिस्तान के खाते में चला गया। इनका जन्म बेशक वर्तमान पाकिस्तान के लायलपुर जिले में हुआ लेकिन पंजाब के नवांशहर अब ( शहीद भगत सिंह नगर) का खटकड़कला भगत सिंह का पुश्तैनी गांव है। गांव में एक पुश्तैनी घर को छोड़कर कुछ भी भगत सिंह से जुड़ी हुई यादें नहीं दिखती है।

गांव के कुछ पहले ही एक प्रवेश द्वार है जो शहीद-ए-आजम भगत सिंह द्वार कहलाता है। जैसा कि पंजाब के अन्य गांवों में प्रवेशद्वार है। इसको पंजाब सरकार ने बनवाया है। मुख्यद्वार के पास ही पंजाब सरकार ने स्मारक बनवाता है। मुख्यद्वार की मुख्य सड़क रेलवे लाइन पार करके भगत सिंह के घर के बगल से निकल जाती है। चार कमरे का यह मकान पीले रंग से पुता है। घर के पास एक पुस्तकालय है। बाहर पंजाब सरकार के सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग का नोटिस चस्पा है।

आधुनिक परिभाषा में यह गांव पूरी तरह से सुख-सुविधओं से पूर्ण है। कहने को तो यह गांव देश के कई शहरों को भी संपन्नता में मात दे सकता है। गांव में सब कुछ है। हरे-भरे खेत, पक्की सड़कें, आलीशान इमारतें जो अप्रवासी ग्रामीणीं के पैसें से बनी है। अगर नहीं है तो भगत सिंह की क्रांतिकारी सोच और उसको अपनाने वाले लोग। पिछले कुछ सालों से गांव में 28 सितंबर (जन्म दिन) और 23 मार्च (शहादत दिवस) को एक सरकारी मेला जरूर लगता है। इस गांव के लिए भगत सिंह इसी सरकारी मेले तक सीमित होकर रह गये हैं।

समाचार पर आपकी राय: