BBC Documentary के तार ‘भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय टूलकिट’ का हिस्सा, कई देशों से जुड़े तार, बीजेपी का इल्ज़ाम

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पीएम नरेंद्र मोदी पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री प्रतिबंध लगने के बाद यह और चर्चा में आ गई है। पहले इसे केरल और हैदराबाद में दिखाने की कोशिश की गई, तो उसके बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इसकी स्क्रीनिंग की गई।

जेएनयू में डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर विवाद थमा भी नहीं था कि इसे दिल्ली की ही एक अन्य यूनिवर्सिटी जामिया में प्रदर्शित किए जाने की तैयारी की जा रही है। इस विवादित डॉक्यूमेंट्री को जिस तरह दिखाने की कोशिश हो रही है, यह मामला भी शाहीन बाग आंदोलन की राह पर आगे बढ़ता दिख रहा है, जिसमें जगह-जगह इस डॉक्यूमेंट्री को दिखाकर केंद्र को असहज करने की कोशिश की जा रही है। क्या इस डॉक्यूमेंट्री के सहारे भाजपा को घेरने की कोशिश की जा रही है? यह एक सामान्य डॉक्यूमेंट्री को प्रतिबंधित करने का मामला है, या इसके तार कहीं ज्यादा गहराई से जुड़े हुए हैं, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और मोदी की छवि खराब करना है। भाजपा ने कुछ इसी तरह का दावा किया है।

वर्ष 2002 से ही गुजरात दंगों के कारण नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश की जाती रही है। देश की मीडिया ने इन दंगों के कारण उन्हें लगातार लंबे समय तक निशाने पर रखा, तो गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें केंद्रीय जांच एजेंसियों की कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ा। लेकिन हर जांच में नरेंद्र मोदी साफ साबित हुए। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी गुजरात दंगों के लिए एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका में कोई गड़बड़ी नहीं पाई थी।

राजनीतिक आलोचक मानते हैं कि नरेंद्र मोदी को इस कड़ी जांच से गुजरने के कारण लाभ ही हुआ था। वे पूरे देश में बड़े हिंदूवादी नेता के तौर पर उभरे और गैर कांग्रेसी खेमे के अगुवा बनते हुए प्रधानमंत्री पद की कुर्सी तक जा पहुंचे। चूंकि, सर्वोच्च न्यायालय तक से इस मामले पर पीएम मोदी को बेदाग करार दिया जा चुका है, माना जा रहा है कि इस डॉक्यूमेंट्री के जरिए इस विवाद को दोबारा जिंदा करने की कोशिश की जा रही है। इसका निशाना भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती ताकत को कमतर करके दिखाना या लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को घेरना हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय भारत विरोधी टूल किट का हिस्सा

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि बीबीसी की इस डॉक्यूमेंट्री को केवल एक फिल्म मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत पूरी दुनिया में बड़ी वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा है। दुनिया की ढहती अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत न केवल अपनी विकास दर और अर्थव्यवस्था में बढ़त बरकरार रखे हुए है, बल्कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। सामरिक मामले में भी देश बड़ी विश्व शक्ति बनकर उभरा है और अब देश हथियारों के आयातक से निर्यातक बन चुका है।

जिस तरह भारत G-20 की अगुवाई कर रहा है, दुनिया की राजनीति में भारत की धमक बढ़ने वाली है। यह बात अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस सहित सभी देश स्वीकार कर रहे हैं। रूस और यूक्रेन विवाद समाप्त करने की दिशा में आज भी दुनिया को भारत से ही उम्मीदें हैं।

प्रेम शुक्ला ने कहा कि चूंकि, भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय धमक का सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को हो सकता है, वह अपने प्रवासी नागरिकों-पत्रकारों के जरिए भारत विरोधी एजेंडे को हवा देता रहता है। टाइम्स मैग्जीन से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स में जिस तरह मोदी और भारत विरोधी एजेंडे को हवा दी गई, उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस विरोध की जड़ें कहीं ज्यादा गहरी हैं और यही कारण है कि इसे केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हमारे देश की सबसे विश्वसनीय संस्था है। आज भी न्याय के लिए पूरे देश को इसी संस्था पर विश्वास है। ऐसे में यदि सर्वोच्च न्यायालय ने किसी मामले को खारिज कर दिया है, तो इस मुद्दे पर किसी दूसरे देश की टिप्पणी हमारे लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।

‘प्रतिबंध सही, बेनकाब हुआ टुकड़े-टुकड़े गैंग’

राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि इस पूरे विवाद को केवल भारत के आंतरिक मामले से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यह समझना चाहिए कि भारत की लगातार बढ़ती अंतरराष्ट्रीय ताकत हमारे सबसे बड़े प्रतिद्वंदी चीन को भी पसंद नहीं आएगी। एक तरफ जहां उसकी अर्थव्यवस्था बर्बाद होने के कगार पर है, भारत ने अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है।

चीन यह देख रहा है कि एपल जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां उसकी जमीन छोड़कर भारत में अपना ठिकाना बना रही हैं। इससे पूरी दुनिया में चीन के विरोध और भारत के पक्ष में संदेश गया है। चीन की हर कमजोरी का लाभ सीधे तौर पर भारत को मिलेगा। इससे भारत में निवेश ही नहीं

बढ़ेगा, यहां उद्योग धंधे और रोजगार बढ़ेंगे। अमेरिकी-यूरोपीय देश अपनी जरूरतों के लिए चीन की बजाय भारत पर ज्यादा आश्रित होंगे तो उनकी नीतियों में भी भारत को ज्यादा प्राथमिकता मिल सकती है।

चूंकि, भारत की मजबूती हर लिहाज से पाकिस्तान और चीन के खिलाफ जाती है, पड़ोसी देश कभी नहीं चाहेंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हो। चूंकि, भारत की इस वर्तमान मजबूती का पूरा खेल मोदी की छवि से जुड़ा हुआ है, उनकी छवि को खराब करने की साजिश रची जा रही है। यह बात टाइम्स मैग्जीन, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट के कई लेखों में देखा जा सकता है।

सुनील पांडे ने कहा कि इस मामले में सबसे ज्यादा खराब बात यह सामने आई है कि अब सत्ता और राजनीति के इस खेल में मुख्य मीडिया को भी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। एक के बाद एक लगातार अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में भारत विरोधी एजेंडे को हवा दी जा रही है। बीबीसी को लंबे समय से भारत विरोधी मंच के रूप में देखा जाता रहा है। जिस तरह अब उसके सहारे भारत की आंतरिक-विदेश राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश हुई है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इस डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगाकर बिल्कुल सही काम किया है और देश के अंदर भी लोगों को इस बात को समझते हुए इस खेल का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।

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