Himachal Pradesh News: हिमाचल हाई कोर्ट ने कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक के करोड़ों रुपये वाले ऋण घोटाले में बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की पीठ ने मुख्य आरोपित होटल मालिक युद्ध चंद बैंस और बैंक अधिकारियों को अग्रिम जमानत दे दी है। न्यायालय ने विजिलेंस की जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जमानत मिलने के बाद बैंस ने मुख्यमंत्री पर उन्हें फंसाने का सीधा आरोप लगाया है।
विजिलेंस की चयनात्मक जांच पर उठे सवाल
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विजिलेंस की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताई है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जिन बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने ऋण को मंजूरी दी, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई। जांच एजेंसी ने कई निदेशकों को केवल नोटिस देकर छोड़ दिया। न्यायालय ने हैरानी जताई कि मुख्य निर्णयकर्ताओं के प्रति एजेंसी इतनी नरम क्यों है। केवल उधारकर्ता और फाइल आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों को हिरासत में लेना बिल्कुल भी न्यायसंगत कदम नहीं माना जा सकता है।
न्यायालय ने साफ किया कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल बैंक की बकाया राशि वसूलने के लिए हथियार की तरह नहीं हो सकता। बैंक के पास सरफेसी अधिनियम और ट्रिब्यूनल जैसे कानूनी विकल्प पहले से मौजूद हैं। जांच में सहयोग न करने के आरोप पर भी न्यायालय ने आरोपित के मौन रहने के अधिकार का समर्थन किया। यदि कोई व्यक्ति अपना अपराध नहीं मानता है, तो सिर्फ इस आधार पर उसे जांच में असहयोग मानकर जमानत देने से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता।
फर्जी यूसी और नियमों की अनदेखी का आरोप
विजिलेंस ने ऊना में वर्ष 2025 के दौरान यह अहम मामला दर्ज किया था। आरोप था कि युद्ध चंद बैंस ने अपने दो होटलों के लिए बीस करोड़ रुपये का भारी ऋण लिया। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह लोन आरबीआई और नाबार्ड के कड़े नियमों को दरकिनार करके दिया गया। विजिलेंस के मुताबिक बैंक अधिकारियों ने डिफाल्टर होने के बावजूद बैंस परिवार को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अनुचित वित्तीय लाभ पहुंचाया था।
मुख्यमंत्री पर साजिश और पैसे फूंकने का आरोप
जमानत मिलने के तुरंत बाद होटल व्यवसायी युद्ध चंद बैंस ने राज्य की सुक्खू सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया। मंडी में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए। बैंस ने दावा किया कि मुख्यमंत्री ने उन्हें जेल भेजने की एक बड़ी साजिश रची है। इस राजनीतिक साजिश में जनता की गाढ़ी कमाई के दो करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर दिए गए। उन्होंने कोर्ट आदेश का हवाला देकर जांच एजेंसी की मंशा पर सवाल उठाए।
बैंस ने आगे कहा कि न्यायालय ने भी यह बात मानी है कि विजिलेंस एक सामान्य सिविल केस को आपराधिक मामला बनाकर पेश कर रही है। उनके अनुसार, जांच एजेंसी जानबूझकर अदालत के सामने अधूरी जानकारी रख रही है। कई महत्वपूर्ण तथ्यों को भी छिपाया गया है। इसका एकमात्र उद्देश्य उन्हें और उनके बेटे हरीश चंद को गलत तरीके से फंसाना है। बैंस ने स्पष्ट किया कि सच्चाई अब कानून के सामने पूरी तरह उजागर हो चुकी है।
हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में माना कि आर्थिक अपराध बहुत गंभीर प्रकृति के होते हैं। लेकिन साक्ष्यों की भारी कमी और चयनात्मक जांच के बीच किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय ने सभी याचिकाकर्ताओं की अंतरिम जमानत को अब अंतिम रूप दे दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया है कि इन शुरुआती टिप्पणियों का मामले के मुख्य ट्रायल पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।


