National News: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संदर्भ पर सुनवाई कर रही है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ राज्यपालों की विधेयक स्वीकृति देने की शक्तियों पर विचार कर रही है। इस मामले में दूसरे दिन की सुनवाई बुधवार को हुई।
संविधान पीठ का गठन
पांच सदस्यीय संविधान पीठ में CJI गवई के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर शामिल हैं। पीठ राष्ट्रपति के उन 14 सवालों पर विचार कर रही है जो विधेयकों पर स्वीकृति की समयसीमा से संबंधित हैं।
मुख्य मुद्दे
राष्ट्रपति ने पूछा है कि क्या न्यायालय राज्यपालों के लिए विधेयकों पर कार्रवाई की समयसीमा तय कर सकता है। इसके अलावा अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों की सीमा भी विचारणीय मुद्दा है। सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान निर्माताओं की मंशा पर प्रश्न उठाए।
सॉलिसिटर जनरल की दलीलें
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का पद राजनीतिक शरणस्थली नहीं है। संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए उन्होंने राज्यपालों की संवैधानिक भूमिका रेखांकित की। मेहता ने संघीय ढांचे के संदर्भ में शक्तियों के बंटवारे पर जोर दिया।
न्यायालय की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान CJI गवई ने पूछा कि यदि विधेयक रोकने की शक्ति अस्वीकार करने की शक्ति बन जाए तो क्या होगा। जस्टिस नरसिम्हा ने अनुच्छेद 200 के तहत रोक लगाने के प्रावधानों की व्याख्या पर ध्यान दिया। पीठ ने राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच सहयोग की अपेक्षाओं पर चिंता जताई।
संवैधानिक प्रश्न
राष्ट्रपति संदर्भ में मुख्य प्रश्न विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा से जुड़े हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या न्यायपालिका कार्यपालिका के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 की व्याख्या इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।
आगे की प्रक्रिया
संविधान पीठ ने इस मामले में सुनवाई जारी रखी है। केंद्र और राज्यों की ओर से विस्तृत दलीलें पेश की जा रही हैं। इस मामले का संवैधानिक महत्व है क्योंकि यह केंद्र-राज्य संबंधों और शक्तियों के बंटवारे से सीधे जुड़ा है। अगली सुनवाई में और स्पष्टता की उम्मीद है।

