चीनी हथियारों की पोल खोलकर रख दी: ईरान से पाकिस्तान तक हर मोर्चे पर ‘कबाड़’ साबित हुए बीजिंग के दावे

Beijing News: दुनियाभर में सस्ती तकनीक का ढिंढोरा पीटने वाले चीन के हथियार अब असली जंग के मैदान में फेल साबित हो रहे हैं. ईरान पर इजराइली हमले से लेकर पाकिस्तान में ऑपरेशन सिंदूर और वेनेजुएला में अमेरिकी मिशन तक, हर जगह चीनी रडार और मिसाइल सिस्टम ‘अंधे’ साबित हुए हैं. जिसे बीजिंग अजेय डिफेंस बताकर अरबों डॉलर में बेच रहा था, वह असली जंग में ‘कबाड़’ निकला.

ईरान में चीन का HQ-9B सिस्टम इजराइली F-35 स्टील्थ फाइटर्स के सामने बेबस नजर आया. 260 किमी की रेंज का दावा करने वाली मिसाइलें इजराइली जैमिंग डिवाइस के सामने दिशा भटक गईं. रूस के S-400 की नकल कर बनाया गया यह सिस्टम ईरान के लिए सबसे बड़ी उम्मीद था, लेकिन यह भी ‘धोखेबाज’ निकला. अब तेहरान को समझ आ गया है कि चीनी माल ‘चले तो चांद तक, नहीं तो शाम तक’ वाली कहावत पर खरा उतरता है.

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की ‘चीनी दीवार’ ढही

7 मई 2025 कोभारत ने आतंकवाद के खिलाफ जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ छेड़ा, तो पाकिस्तान का घमंड टूट गया. चीन से खरीदे गए YLC-8E एंटी-स्टील्थ रडार धरे के धरे रह गए. भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों ने महज 23 मिनट में तबाही मचा दी. चीन दावा करता था कि ये रडार 450 किमी दूर से राफेल को पकड़ लेंगे, लेकिन भारतीय इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ने इन्हें पूरी तरह जाम कर दिया. पाकिस्तान के 82 फीसदी हथियार चीनी हैं और इस हमले ने साबित कर दिया कि वे आधुनिक युद्ध में सिर्फ खिलौने हैं.

पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा की रीढ़ मानी जाने वाली PL-15E मिसाइलें उस वक्त मजाक बन गईं जब वे अपने टारगेट को छू तक नहीं पाईं. भारत ने एक ऐसी ही मिसाइल को सही-सलामत बरामद किया, जिसकी जांच में चीनी रॉकेट मोटर और गाइडेंस सिस्टम में भारी कमियां पाई गईं. भारत के आकाश-NG और MRSAM सिस्टम ने चीन की लेजर-गाइडेड मिसाइलों को हवा में ही ढेर कर दिया.

वेनेजुएला में 2 अरब डॉलर का निवेश ‘जीरो’

वेनेजुएलाने अपनी सुरक्षा के लिए चीन पर 2 अरब डॉलर लुटा दिए, लेकिन जनवरी 2026 के ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ ने सब बर्बाद कर दिया. अमेरिकी डेल्टा फोर्स ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से उठा लिया और चीनी JY-27A रडार को भनक तक नहीं लगी. चीन ने इसे ‘स्टील्थ किलर’ कहा था, लेकिन अमेरिकी जैमर्स के सामने इसका सॉफ्टवेयर ‘हैंग’ हो गया. यह विफलता बताती है कि चीन की इंजीनियरिंग सिर्फ कागजों पर शेर है, हकीकत में वह पूरी तरह बेबस है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ भाषण में तंज कसते हुए कहा कि जो देश विदेशी और घटिया तकनीक पर भरोसा करते हैं, उनका यही अंजाम होता है. ट्रंप का इशारा साफ था कि भारी-भरकम मिलिट्री इंस्टॉलेशन के बावजूद चीनी रडार एक साधारण घुसपैठ भी नहीं रोक पाए. यह बीजिंग की ग्लोबल इमेज पर अब तक का सबसे बड़ा कूटनीतिक प्रहार था.

कमजोर सॉफ्टवेयर और घटिया इंजीनियरिंग का कॉकटेल

इन सभीनाकामियों के पीछे एक ही पैटर्न है- चीन की रिवर्स इंजीनियरिंग की आदत. रूस और पश्चिम की नकल करके बनाए गए इन हथियारों का सॉफ्टवेयर असली इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के लिए तैयार ही नहीं है. चीन ने दुनिया को ‘सस्ता विकल्प’ तो दिया, लेकिन उसमें क्वालिटी और रिलायबिलिटी गायब है. चाहे वह पाकिस्तान की मिसाइल मोटर हो या ईरान का टारगेटिंग सीकर, चीनी हथियारों का हर पुर्जा अब संदेह के घेरे में है.

रक्षा विशेषज्ञ अब इसे ‘बीजिंग का रणनीतिक धोखा’ कह रहे हैं. जिन देशों ने चीन पर भरोसा किया, उन्हें अब पछताना पड़ रहा है. ‘सस्ते’ के चक्कर में इन देशों ने अपनी सुरक्षा दांव पर लगा दी और अब नतीजा सबके सामने है. चीन की यह पोल खुलने के बाद अब दुनिया के कई देश अपने रक्षा सौदों पर दोबारा विचार कर रहे हैं.

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