देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए भारत सरकार द्वारा भारतीय अर्थ-व्यवस्था को कैश –लेस्स इकोनोमी बनाने की सोच काफी हद तक सरहनीय है। देश की जनता यह समझने लगी है कि अब खरीददारी कि कीमत अदा करने के लिए स्वाइपिंग मशीन,पे-टी-एम,ई–मोबाइल इत्यादि का सहारा लेना होगा । उपभोगता एवं विक्रेता का बैंक में खाता होना अनिवार्य हैं, जिस से उसकी आय का आकलन हो सके और आयकर, सेवाकर, वस्तुकर इत्यादि से देश के खजाने में वृद्धि हो एवं विकास दर बढ़े, लेकिन हमारे देश में अर्थ-व्यवस्था का संचालन राजनीतिक इच्छा-शक्ति से होता है और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सकारात्मक राजनीतिक इच्छा-शक्ति का होना अनिवार्य है।

हमारे देश कि सरकार ने अर्थ व्यवस्था कि विकास दर बढाने के लिए इसे कैश-लेस्स करने के लिए विदेशों का अनुसरण तो कर लिया देश कि राजनीतिक व्यवस्था को विकसित देशों कि तर्ज़ पर लाने कि पहल नहीं की। विश्व यह जानता है कि सुपर पावर अमेरिका में एक व्यक्ति राष्ट्रपति का चुनाव अपने जीवन काल सिर्फ दो वार ही लड़ सकता है। उस देश के राष्ट्रपति को पता है कि यह अपने जीवन में दो वार राष्ट्रपति बनकर जो भी सुधार कर सकता है, उसे करने हैं, चाहे फैसले कड़वे ही क्यों नहीं लेने पड़े। वो सत्ता के लालच में जनहित के फैसले नही बदलता। जबकि भारतवर्ष में स्तिथि विपरीत है।

कहने को तो भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रीय देश है, लेकिन एक बार राजनीति में घुसा व्यक्ति या परिवार वर्षों तक राजतंत्र प्रणाली कि तरह इस देश पर साशन कर रहा है। उसे पूरी उम्र कैसे सत्ता में बने रहना है ये वो पारिवारिक पृष्ठभूमि से भली भांति जान चुका होता है। लोकतन्त्र तो उसके लिए मात्र कागजी शब्द है। क्या इस देश में पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक यह नियम या कानून बन सकता कि एक व्यक्ति एक पद पर जीवन मात्र दो बार ही चुनाव लड़ सकता है ?

उसके बाद करोड़ों भार्तियों में से दूसरों को भी अपनी सोच देश के सामने लाने क अवसर मिल सके। आज का सत्तारूढ नेता कड़े फैसले इसलिए नहीं ले पाता कि उसे बार-बार चुनाव लड़ना है। इस सोच के कारण वो किसी से भी बिगाड़ना नहीं चाहता, उसे उन लोगों को भी वोट बैंक कि खातिर अपने साथ रखना है, जिन्हें जनता पसंद न भी करती हो। लेकिन नेता के लिए वो भी जी-जान की बाजी लगा सकते हों। चाहे वे कोई भी हों अनैतिक कार्य ही क्यों न करते हों। आज समाचार पत्रों में सड़कों किनारे अतिक्रमण की ही बात आती हो चाहे वो स्थायी अतिक्रमण या अस्थाई ? पुलिस ,प्रसाशन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती। क्योंकि अतिक्रमणकारी इक्कठे होकर स्थानीय नेता के पास चले जाते हैं और नेता उन लोगों में अपना वोट – बैंक देखता हैं और पुलिस एवम प्रसाशन को इशारा कर देता है कि यह उसके आदमी हैं । इसी तरह कोई भी अधिकारी, कर्मचारी हो, लोगों को उसका काम पसंद हो या न हो लेकिन नेता कि कृपा-दृष्टि से वह लोगों के लिए कोपभाजन बना रहेगा। अगर हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव लड़ने का अधिकार जीवन मात्र दो ही बार हो तो कम से कम अंतिम पारी में वही नेता कड़े फैंसले लेकर आम जनता को समस्याओं से निजात दिलाने का प्रयत्न करेगा कि लोग उसे उसके कार्यों के लिए राजनीतिक जीवन के बाद भी याद रखे। आज वर्षों तक राजनीतिक जीवन बिताने के लिए भी भ्रष्टाचार होता है।

देश में विमुद्रीकरण के बाद भी कुछ लोगो ने करोडों रुपए जमा कर लिए यह बिना संरक्षण प्राप्त लोग तो नहीं हो सकते? जब देश में वस्तु-विनिमय प्रणाली थी तब तब भ्रष्टाचार नहीं था। लोगों वस्तु विनिमय प्रणाली समाप्त हुई, मुद्रा का प्रचनल बड़ा भ्रष्टाचार भी धीरे-धीरे अपने पाँव पसारता गया और आज यह अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया। आज मुद्रा विनिमय प्रणाली को कैश लेस्स करने का प्रयत्न किया जा रहा है जो एक हद तक भ्रष्टाचार मिटाने में सफल तो होगी, लेकिन जब तक हमारे देश की लोकतन्त्र प्रणाली में राजतंत्रीय व्यवस्था को बदलने के लिए कानून और आम सहमति नहीं बनती तब तक कैश लेस्स व्यवस्था भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने में पूरी तरह से कारगर सिद्ध नहीं हो सकती।

अगर देश में अमेरिका की तरह एक व्यक्ति द्वारा जीवन में दो बार ही चुनाव लड़ने का कानून बन तो सरकारें कड़े फैंसले भी ले सकेंगी और देश ने बहुत से लोगों को भी शाशन में भागीदारी का अवसर प्राप्त हो सकेगा। सही मायनों में यही वास्तविक लोकतन्त्र होगा। ऐसे नहीं की राजनीति में वर्षों से बने लोग अपने धन-बल के कारण सत्ता में तो बने रहते हैं। लेकिन देश को वो गति नहीं दे पाते, जो देश को अमेरिका की तरह सुपर पावर की ओर ले जा सके। आज हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राज्यसभा का उदाहरण लोगों के सामने है, जिसमें से सत्तारूढ़ दल के चहेते ही राज्यसभा के सांसद होते है। कई बार तो जनता द्वारा चुनावों में नकारे गए लोग भी राज्यसभा के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा चुनकर भेज दिये जाते हैं। लोकसभा के सदस्य तब तक किसी बिल को कानून नहीं बना पाते, जब तक वो राज्यसभा में पास नहीं हो जाता। जबकि लोकसभा के सदस्य लोकतंत्रीय प्रणाली के तहत जनता ने चुन कर भेजे होतें हैं फिर भी लोकसभा, राज्यसभा के आगे बौनी बन कर रह जाती है।

संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी लोकतंत्रीय व्यवस्था में राज्यसभा गठन पर शंका व्यक्त की थी, राज्यसभा लोकतंत्र के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है और आज यह देखने को मिलता है कि राजनीतिक खींचतान के चलते कई जनहित के बिल राज्यसभा में पारित न होने के कारण कानून बन ने से रह जाते हैं। आज भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जरूरी है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था में भी परिवर्तन किया जाए। जिस से कैश लेस्स अर्थ व्यवस्था जैसी व्यवस्थाएं कारगर सिद्ध हो सकें ।

By RIGHT NEWS INDIA

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