राजस्थान में स्कूलों के हालात; स्कूल की बिल्डिंग है, शिक्षक है, लेकिन पढ़ने वाला कोई नहीं, जानिए क्या है बड़ा कारण

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जयपुर. सरकारी स्कूल नाम सुनने पर अक्सर मन में जर्जर स्कूल भवन और शिक्षकों के अभाव वाली तस्वीर उभरती है. लेकिन आज हम जो खबर लेकर आए हैं, उसमें मन के उभरते भाव से ठीक उलट तस्वीर है. यहां स्कूल भवन है, पढ़ाने के लिए शिक्षक भी हैं, लेकिन पढ़ने के लिए छात्र ही नहीं हैं. यहां केवल एक विद्यार्थी का नामांकन है, लेकिन वो भी स्कूल नहीं आ रहा है.

जयपुर में राजधानी की चकाचौंध भरी दुनिया से महज 25 से 27 किलोमीटर दूर बस्सी क्षेत्र के सुजानपुरा गांव देवाना की ढाणी में स्कूल (Devana Ki Dhani primary school) का हाल जिसने भी देखा है, वो हैरान रह गया. यहां शिक्षण कार्य के लिए व्यवस्थाएं तो हैं लेकिन पढ़ने के लिए पढ़ने के लिए बच्चे ही नहीं हैं.

‘मास्टरजी’ पहुंच रहे स्कूल, बच्चे नहींः सुबह के 7:30 बज गए, ‘मास्टरजी’ अपनी बाइक पर हर दिन की तरह समय से पहले ही स्कूल पहुंच गए. आंखें स्कूल कैंपस से बाहर ही लगातार टकटकी लगाए हुएं थीं. इंतजार करते-करते लंच का समय हो गया, फिर कुर्सी पर बैठकर बस यही सोच रहे थे कि जिस एकमात्र छात्र का सेकेंड क्लास में एडमिशन हुआ है, वही आ जाए तो कुछ पढ़ा लें. इस सोच विचार में दोपहर के 1.30 बजे गए, बस इसके बाद मास्टरजी स्कूल से रवाना हो गए. ये स्थिति एक सरकारी स्कूल की है, जो राजधानी जयपुर से महज 25-27 किलोमीटर दूर बस्सी क्षेत्र के सुजानपुरा गांव देवाना की ढाणी में स्थित है. यहां स्कूल भवन है , शिक्षक है लेकिन नहीं हैं तो उसमे पढ़ने वाले बच्चे. स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ने वाले एक छात्र का नामांकन है. लेकिन हालात यह है कि वह भी पढ़ने के लिए नहीं आता. यह स्थिति केवल एक सरकारी स्कूल की नहीं है, बस्सी ब्लाक में ऐसी करीब 7 सरकारी स्कूल हैं, जहां विद्यार्थियों का नामांकन 10 से कम है.

क्या कहते हैं गुरुजीः अध्यापक विष्णु मीणा ने बताया यहां एक छात्र का नामांकन है. मेरी ड्यूटी 28 जुलाई से यहां लगाई गई है . विष्णु स्कूल में छात्रों का नामांकन नहीं होने पर कहते हैं कि स्कूल तो पुराना है लेकिन गांव वाले कई बार सम्पर्क करने पर भी बच्चों को पढ़ने नहीं भेज रहे है . एक छात्र का नामांकन है लेकिन वो भी नहीं आता. उन्होंने कहा कि वे हर दिन स्कूल आते हैं और नामांकन के लिए अभिभावकों का इंतजार करते हैं, लेकिन कोई नहीं आता. उन्होंने बताया कि वे पहले जिस स्कूल में थे, वहां 65 से अधिक बच्चे थे, लेकिन अभी जहां तबादला हुआ है यहां एक बच्चा भी पढ़ने के लिए नहीं आता है. उन्होंने कहा कि जिस सरकारी स्कूल में 65 से ज्यादा बच्चे हैं, वहां दो टीचर हैं. लेकिन सरकारी आदेश के आगे क्या कर सकते हैं.

हाईवे बनी स्कूल के नामांकवन में रोड़ाः जब ईटीवी भारत की टीम ये जानने में जुटी कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आते हैं तो हैरान करने वाला मामला सामने आया. दरअसल देवाना की ढाणी जयपुर आगरा हाइवे की दूसरी ओर है और स्कूल उसके उल्ट दूसरी ओर है. ऐसे में हाइवे क्रास करके बच्चे स्कूल कैसे पहुंचे? . अध्यापक विष्णु मीणा कहते हैं कि जब पेरेंट्स के पास बच्चों के दाखिले के लिए जाते हैं तो वो कहते हैं बच्चों को रोड क्रॉस कराने की जिम्मेदारी कौन लेगा? . नेशनल हाइवे पर हर सेकेण्ड में गाड़ी निकलती है. इस पर विष्णु मीणा कहतै हैं कि मैं भी जिम्मेदारी कैसे ले लूं रोड क्रॉस कराने की. स्कूल ही ढाणी के अपोजिट में बनी है . इसके साथ ही चलो एक बार मान लेते हैं कि बच्चों के परिजन जोखिम लेते हुए बच्चों को हाइवे क्रॉस कराकर स्कूल की तरफ भेज भी दें, लेकिन स्कूल से ठीक पहले एक बड़ी खाई बच्चों का रास्ता रोक देती है.

2002 में बना था स्कूलः ऐसा नहीं है कि ये स्कूल नया है . 2002 में ये स्कूल खोली गई थी . इस प्राथमिक स्कूल में पढाई कर चुके विश्राम मीणा कहते हैं स्कूल 2002 में खोली गई थी, तब स्कूल में 100 से ज्यादा बच्चों का नामांकन था. मैं खुद इस स्कूल में प्राथमिक शिक्षा ली है . शुरू के दौर में स्कूल बहुत अच्छे से चली टीचर भी आते थे , पढ़ाई भी बहुत अच्छी होती थी , लेकिन 2010 से बाद से स्कूल में बच्चों की संख्या कम होती चली गई. इसक बड़ा कारण नेशनल हाइवे है . सुजानपुरा गांव देवाना की ढाणी हाईवे के उस तरफ है और स्कूल दूसरी तरफ. उन्होंने कहा कि पहले नेशनल हाइव नहीं था और रोड प्र यातायात भी कम था. लेकिन अब ट्रैफिक का दबाव बढ़ गया है. गांव वाले बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे हैं.

2014 के बाद बोर्ड पर नहीं बदली तारीखः स्कूल की तस्वीर जो देखी वह सरकार के दावों की पोल खोलती हुई नजर आई. आलम यह है किसी भी कमरे का दरवाजा साबूत नहीं है , खिड़कियां टूटी हुई है, सफाई तो वर्षों से नहीं हुई . क्लास में पड़ी शराब की बोतल बता रही है कि शिक्षा का मंदिर अब शराबियों का अड्डा बन चुका है. इसी दौरान हमारी नजर ब्लैक बोर्ड पर गई तो वहां 21-8-2014 की डेट लिखी दिखाई दी. दूसरे कक्ष में गए तो वहां 22-8- 2014 की डेट दिखाई दी. यानी साफ है 2014 के बाद उस स्कूल में पढ़ाई हुई ही नहीं है . 2014 में जब सरकार बीजेपी आई और वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थी तब कम नामांकन के कारण स्कूल बंद कर दिया गया. लेकिन प्रदेश में सरकार बदलने के बाद 2020 में फिर से स्कूल शुरू हुआ . तमाम कोशिशों के बावजूद तीन से चार छात्रों का एडमिशन हुआ , लेकिन 2021 में केवल 1 छात्र आर्यन स्वामी ही रह गया. वह भी इस सेशन में स्कूल ही नहीं आया. बताया जा रहा है कि वो भी अपनी बहन के साथ दूसरी स्कूल में जाता है . अब स्कूल में नामांकन तो एक है लेकिन संख्या शून्य . टीचर आते हैं, रजिस्टर में खुद की हाजिरी लगा कर चले जाते हैं .

क्या कहते हैं जिम्मेदारः यह तस्वीर बता रही है कि आजाद भारत में आज भी पाठशाला की राह कितनी मुश्किल है . टीचर और ग्रामीणों की व्यथा आपने सुनी अब जरा अधिकारियों की बात सुन लेते हैं. एडिशनल सीबीईओ बस्सी जय नारायण मीणा से बात की तो उन्होंने इस बात की जानकारी होने से इनकार कर दिया कि वहां बच्चों का नामांकन नहीं हुआ है. वो कहते हैं कि मैं खुद मौका देख कर आया हूं 3 से 4 बच्चों का एडमिशन है , फिर भी आप ने जानकारी में डाला है मैं प्रिंसिपल से बात करूंगा . मैं खुद मौका मुआयना कर लूंगा , कोशिश करेंगे कि वहां बच्चों को लाया जाए.

जिम्मेदार कौनः टीचर की अपनी पीड़ा है , पेरेंट्स बच्चों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहते . मगर सच यही है कि देवाना की ढाणी में एक तरह से जीरो नामांकन है . खंडर होती स्कूल की बिल्डिंग, शराबियों का अड्डा बनी पाठशाला और शिक्षा की दुर्दशा की गवाही देता है स्कूल. सवाल यह भी उठता है कि जब स्कूल का निर्माण कराया जा रहा था, तब क्या जिम्मेदारों को यह ध्यान नहीं आया कि हाइवे के एक तरफ गांव है तो दूसरी तरफ स्कूल क्यों बनाया जाए?. साथ ही सवाल यह भी है कि जब नामांकन ही नहीं है तो स्कूल खोल क्यों रखा है?. टीचर की ड्यूटी क्यों लगा रखी है ? जबकि दूसरी और राजस्थान के अधिकतर विद्यालयों में टीचर की कमी देखने को मिल रही है. शिक्षक टीचर अनुपात राजस्थान में अधिकतर स्कूलों में नहीं है.

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