‘भारत अखंडन’ वो दस्तावेज जो वर्तमान को जोड़ते हैं अतीत से

RIGHT NEWS INDIA: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध और नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरुद्ध हुआ कथित आंदोलन, इन सबके पीछे की मानसिकता और वैचारिक समर्थन के मूल को समझने का प्रयास अक्सर बहुत लोग करते दिखाई देते हैं।

इस संबंध में बहुत से भावपूर्ण तर्क भी दिए जाते हैं और जिहाद की परिभाषाएं एवं लक्ष्य समझाने का भी प्रयास होता दिखता है। हालांकि ऐसे सभी प्रयासों में एक कमी रह जाती है और वह कमी है तथ्यों की। तथ्यों के आधार पर बातों को स्पष्ट न कर पाना ही ऐसे प्रयासों को निष्फल कर देता है। इस कमी को पूरा करती है संजय दीक्षित की लिखी पुस्तक ‘भारत अखंडन’।

‘भारत अखंडन’ वस्तुत: एक पुस्तक नहीं, अपितु दस्तावेज है, जिससे क्रमिक रूप से उद्धरणों और उदाहरणों के माध्यम से यह समझने का मार्ग प्रशस्त होता है कि जो वर्तमान हम आज देख रहे हैं, अतीत में उसके तार कहां से जुड़ते हैं। कैसे देश की स्वतंत्रता के लिए चल रहा आंदोलन द्विराष्ट्र सिद्धांत की ओर बढ़ जाता है और कैसे दशकों बाद भी एक तबका राष्ट्र और समाज की व्यवस्था को अपनाने को तैयार नहीं है।

इस पुस्तक को सीएए की अधिसूचना के तुरंत बाद लिखा गया था। एक ओर कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना और उसके बाद सीएए की अधिसूचना आना, इन दोनों कदमों से देश और समाज पर दूरगामी परिणाम दिख रहे थे। एक बड़ा परिणाम यह था कि राष्ट्रहित के कार्यों से जुड़े निर्णय की प्रक्रिया में एक समुदाय विशेष की वीटो की शक्ति समाप्त होने का मार्ग प्रशस्त हुआ। देश दशकों से तुष्टीकरण और विवाद के वास्तविक समाधान के बीच के अंतर को नहीं समझ पाने वाले नियंताओं के विभिन्न निर्णयों के परिणाम भोग रहा था। हर निर्णय के केंद्र में एक समुदाय विशेष के आग्रह और दुराग्रह को साधने का प्रयास किया जाता रहा, चाहे उससे समाज के

एक बड़े वर्ग पर कितना ही दुष्प्रभाव क्यों न हो। इस प्रकार के अभिशप्त शासन से बाहर निकलते हुए देश ने ऐसी चेतना का अनुभव किया, जहां यह लगा कि सरकार ऐसे निर्णय लेने में सक्षम है, जिनसे राष्ट्रहित जुड़ा है। ऐसे निर्णयों पर किसी वर्ग विशेष को वीटो का अधिकार नहीं मिलेगा।

पुस्तक में इन्हीं दोनों कदमों के पूर्व संदर्भों को केंद्र में रखा गया है। हालांकि लेखक ने अपने प्राक्कथन में सीएए के विरुद्ध हुए कथित आंदोलन के कारण सरकार के कदम थामने पर निराशा भी व्यक्त की है। इसके बावजूद इन कदमों की महत्ता किसी भी दृष्टि से न कम होती है और न ही पुस्तक की समसामयिकता पर कोई प्रभाव पड़ता है।

पुस्तक में बंगाल विभाजन के संदर्भ से शुरुआत की गई है। किस तरह से बंगाल विभाजन की नींव रखी गई और अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो के सिद्धांत के रूप में कलह के बीज बोए। 1911 में बंगाल विभाजन का फैसला वापस तो हुआ, लेकिन नुकसान हो चुका था। इसके बाद क्रमिक रूप से बढ़ते हुए पुस्तक महात्मा गांधी के भारत आने, प्रथम विश्व युद्ध में भारत के शामिल होने, महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की भूल और मालाबार नरसंहार के तथ्यों को सामने रखती है। पहले भाग में नागरिकता अधिनियम, 1955 तक के संदर्भ दिए गए हैं। दूसरे भाग में कश्मीर की जनसांख्यिकी में बदलाव के शुरुआती प्रयासों से लेकर कश्मीरी पंडितों के पलायन तक के संदर्भों को सामने रखा गया है। इसके बाद पुस्तक सामयिक घटनाओं पर दृष्टि डालती है।

बात जब भी जिहाद और वर्ग विशेष की विचारधारा से जुड़े मुद्दों की होती है, तो अक्सर तथ्यों से ज्यादा भावनाओं पर आधारित तर्क रखे जाते हैं। सामने वाला पक्ष इसी को आधार बनाकर उन तर्कों को खारिज भी कर देता है। संजय दीक्षित ने इस पुस्तक में यह मौका नहीं दिया है। हर पन्ने पर लिखी हर बात के लिए जिस तरह से विभिन्न उद्धरणों को समेटा गया है, वह सामने वाले को किसी भी तर्क को काटने का अवसर नहीं देता है।

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