Entertainment News: बासु चटर्जी को भारतीय सिनेमा का पायनियर माना जाता है। उन्होंने मध्यमार्गी फिल्मों की एक नई शैली विकसित की। यह फिल्में मुख्यधारा मनोरंजन और समानांतर सिनेमा के बीच संतुलन बनाती थीं। उनकी फिल्मों में न तो अतिरिक्त मसाला होता था और न ही भारी भरकम कला। आज उनकी जयंती के अवसर पर जानते हैं उनके योगदान के बारे में।
बासु चटर्जी की फिल्मों की दुनिया बिल्कुल साधारण थी। उनकी कहानियां आम जिंदगी और रोजमर्रा के रिश्तों पर केंद्रित होती थीं। उन्होंने मध्यमवर्गीय परिवारों की सरल कहानियां दर्शकों तक पहुंचाईं। ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ जैसी फिल्में इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें अनावश्यक नाटक या एक्शन के लिए कोई जगह नहीं थी।
आम जीवन से जुड़ी थीं कहानियां
बासु चटर्जी का जन्म 10 जनवरी 1930 को राजस्थान के अजमेर में हुआ था। उनका परिवार बंगाली था। उन्होंने अपना करियर मुंबई में एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया। लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने एक पत्रिका में काम किया। इसके बाद उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखा।
साल 1966 में वह फिल्म इंडस्ट्री में असिस्टेंट डायरेक्टर बने। एक निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘सारा आकाश’ 1969 में आई। इस फिल्म ने शादी के बाद की चुनौतियों को संवेदनशीलता से दिखाया। फिल्म ने दर्शकों और आलोचकों दोनों का दिल जीता।
अमोल पालेकर बने आम आदमी का चेहरा
बासु चटर्जी की फिल्मों ने पारंपरिक हीरो की परिभाषा बदल दी। उनके नायक गुंडों से नहीं लड़ते थे। वे रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ते नजर आते थे। अमोल पालेकर उनकी फिल्मों में मध्यवर्गीय भारतीय का प्रतिनिधित्व करते थे।
‘छोटी सी बात’, ‘रजनीगंधा’ और ‘बातों बातों में’ जैसी फिल्मों ने अमोल पालेकर को स्टार बनाया। इन फिल्मों ने बिना किसी शोर-शराबे के बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की। दर्शकों ने इन साधारण कहानियों को खूब पसंद किया।
टेलीविजन पर भी रचा इतिहास
बासु चटर्जी ने टेलीविजन की दुनिया में भी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘ब्योमकेश बख्शी’ सीरियल बनाया। यह सीरियल 1993 से 1997 तक प्रसारित हुआ। इसमें राजित कपूर ने मशहूर बंगाली जासूस का किरदार निभाया।
साल 1985 में आया उनका टीवी शो ‘रजनी’ भी बेहद लोकप्रिय हुआ। प्रिया तेंदुलकर ने इस शो में सामाजिक मुद्दों को उठाया। यह दोनों कार्यक्रम अस्सी और नब्बे के दशक में घर-घर देखे जाते थे। इनकी एक विशाल और वफादार दर्शक समुदाय था।
मृणाल सेन ने की थी खास तारीफ
बासु चटर्जी की पहली फिल्म ‘सारा आकाश’ ने विशेष पहचान बनाई। इस फिल्म को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा से प्रेरणा लेकर बनाया था। प्रख्यात निर्देशक मृणाल सेन ने इस फिल्म की खास तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि यह फिल्म फिल्मकारों के लिए बनाई गई है।
बासु चटर्जी की फिल्में उद्योग के लोगों को भी पसंद आती थीं। उनकी सादगी और ईमानदार कहानी कहने का अंदाज सबको भाता था। उन्होंने अपने करियर में कभी समझौता नहीं किया। वह हमेशा अपनी विशिष्ट शैली पर टिके रहे।
एक अमिट विरासत
बासु चटर्जी ने 4 जून 2020 को 93 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी रचनाएं आज भी जीवित हैं। ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ जैसी फिल्में आज भी प्रासंगिक हैं। ‘ब्योमकेश बख्शी’ सीरियल के रीरन बनते रहते हैं।
उनका सिनेमा समय से परे है। नई पीढ़ी के दर्शक भी उनकी फिल्मों से जुड़ाव महसूस करते हैं। भारतीय सिनेमा में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने साबित किया कि साधारण कहानियां भी असाधारण प्रभाव छोड़ सकती हैं।

