जिला कुल्लू में बैरागी समुदाय के लोग साढ़े 300 साल पुरानी होली की प्राचीन परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। भगवान रघुनाथ के कुल्लू आगमन पर 1660 ईस्वी से लेकर अयोध्या की तर्ज पर होली उत्सव की परंपरा चली आ रही है। जिला में बसंत पंचमी से होली पर्व आगाज होता है और बैरागी समुदाय के लोग ब्रज भाषा में होली के गीत गाते हैं। भगवान रघुनाथ को जहां-जहां रखा वहां पर भी होली की प्राचीन परंपरा को निभाया जाता है। बैरागी समुदाय द्वारा मनाई जाने वाली इस होली का संबंध नग्गर के झीड़ी और राधा कृष्ण मंदिर नग्गर ठावा से भी है। भगवान रघुनाथ मंदिर में होलाष्टक में 8 दिन तक हर रोज शाम के समय मंदिर में बैरागी समुदाय के लोग इकट्ठे होकर होली गीत गाते हैं, जिसमें भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह होली का रंग फैंकते हैं और भगवान रघुनाथ की पूजा-अर्चना होती है।

होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ को झुलाया जाता है झूला

होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ के मंदिर में फूल ढोल का कार्यक्रम होता है, जिसमें भगवान रघुनाथ को झूला झुलाया जाता है। बैरागी समुदाय के सदस्य सतीश महंत ने बताया कि बैरागी समुदाय के लोग पिछले साढ़े 300 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं, जिसमें बसंत उत्सव से लेकर 40 दिन तक होली उत्सव मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि होलाष्टक में 8 दिन तक बैरागी समुदाय के लोग गुरु पेयहारी बाबा झीड़ी, नग्गर ठावा जगती पाट व भगवान रघुनाथ के मंदिर में बृज भाषा में होली गायन करते हैं।

16वीं सदी के मध्य में कुल्लू आए थे भगवान रघुनाथ

उन्होंने कहा कि 16वीं सदी के मध्य में भगवान रघुनाथ का कुल्लू में आगमन हुआ है तब बैरागी समुदाय के लोग इसको निभा रहे हैं। होलाष्टक में 8 दिन तक संध्या बेला में बैरागी समुदाय होली गीत गाते हैं। जिससे होलिका दहन में भी आते हैं और होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ मंदिर में फूल ढोल के कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इसके साथ होली उत्सव का समापन होता है।

वृंदावन की तर्ज पर 40 दिन तक मनाया जाता है पर्व

भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि कुल्लू जिला में होली का उत्सव मथुरा वृंदावन की तर्ज पर 40 दिन तक मनाया जाता है। होलाष्टक में 8 दिन तक भगवान रघुनाथ मंदिर में सायंकाल में गुलाल भी फंैका जाता है। जिसमें होलिका दहन में फाग में फेरे भी लगाते हैं और फाग की ध्वजा ले जाते हैं। उसके दूसरे दिन भगवान रघुनाथ के साथ होली खेलते हैं और भगवान अपने गर्भगृह से बाहर आते हंै और भगवान रंग लगाते हंै जिसके बाद भोग प्रसाद बांटा जाता है। इसके साथ होली उत्सव समाप्त होता है।

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